Thursday, June 18, 2026

जे.जे. कॉलोनी:


 

भाग-5

 हेलो मनोहर! हम पुकारे

हँ,भैया गोड़ लगैत छी

खूब नीके रहू मनोहर। सब कुशल-मंगल! अहाँ तँ कहियो अबितो नहि छी।भेटघाट होइत रहबाक चाही ने।हँ,सुनू मनोहर हम पारिवारिक डेरा ल' लेलहुँ अछि।अहाँक भौजी आओर दीपक सेहो गामसँ आबि गेल छथि‌।अहाँ काल्हि डेरापर आउ।दिनक भोजन संगे करब।देबू कें सेहो फोन करैत छियनि।

हँ,भैया एबे करब।डेरा कोनठाम लेलियै अछि?

मनोहर!डेरा संगम विहार कालोनीमे अछि।शिव मंंदिरसँ सटले दक्षिण भी.झाक मकानमे।अपने मिथिलाक छथि।नाम छियनि विश्वनाथ झा।कालोनीमे भी.झाक नामसँ ख्यात छथि।

बेस पुकारे भैया।एबे करब।एखन फोन रखैत छी।किछु जरूरी काज क' रहल छी।

सुनै छी कुमकुम! 

'हँ,यौ सुनै छी कान दुरूस्त अछि।'

'नीक बात।तँ सुनू।काल्हि मनोहर आ देबू कें अपना डेरापर बजा रहल छियनि।दिनक भोजन हमसब संगे करब।

कुमकुम पुकारे झा दिश उन्मुख होइत कहलनि,"एँ यौ! एखन तँ पूरा वर्तनोवासन नहि अछि।कोना खाना बनत?

छौ-नौ  थोड़े बनेबाक छै।जाइ छी एन आइ ए मार्केट ओत्तहिसँ एक-डेढ़ किलो माछ नेने अबैत छी।माछ-भात लिअ बस!

ठीक छै जे आज्ञ,कुमकुम बजली।

देबु पुकारे सँ जिज्ञाशा करैत पुछलनि!भैया मनोहर एखन धरि नहि पहुँचल छथि।

'अबिते हेताह।

कनियेकालक पछाति, एकटा चमचमाइत कार पुकारे झाक डेराक सोँझा ठमकलै ओहि कारसँ मनोहर उतरलाह।

मनोहरकें पहुंचिते मातर देबु प्रश्न केलनि ककर कार छलयै यौ?

हमर मैडम के कार छलयै।की कहु देबु भाइ, हमरा रवियोक' छुट्टी कहाँ रहयै।मैडम कालेजक चेयरमैनक बेटी छै।ओएह मैनेजिंग डाइरेक्टर छै।किछु दिन सँ ओ हमरा अपना संगे राख' लागल अछि ।जतय-जतय जैत ओकरा  संग रहियौ।कोनो टाइम टेबल नहि छैक।रातिक आठ-नौ बजे धरि ओकरा संगे रहय पड़ैत छैक।

'आबि गेलहुँ मनोहर।'

हं,भैया,आबि गेलहुँ।

'भौजी कतय छथि?'

ओहिकात भानस क' रहल छथि।

मनोहर जाक'कुमकुमक पैर छुबैत छथि।

'गोड़ लगैत छी भौजी।'

खूब नीके रहू मनोहर।आब जल्दी सँ विवाह क' लिअ।ई दिल्ली छै बौआ।चमक -दमकमे ओझरेलहुँ तँ गेले बुझू।एखन तँ देखिते छियै।कतेको जे  गाम सँ दिल्ली  अबयै से एतय सँ एकटा के नेने गाम पहुँच जाइये।कैकटा विआहलो के ई किरदानी छै।अहाँ तँ एखन काँच कुमार छी। आर सब ठीक ने यौ मनोहर बौआ।

हं,भौजी,सब ठीक अछि।नोकरी भेट गेलय। रहै के जगह सेहो मालिक द' देलकए।

'गाम-घरक हाल-चाल कहु भौजी।'

गाम घरक हाल-चाल ठीके अछि।कोनो परिवर्तन नै।अहुँक माय-बाबू ठीके छथि।गाममे रहयवला लोक आब रहयै थोड़े।आब लोक समय खेपि रहल अछि।

चलू मनोहर ! भोजन क' ली।जखन बनि गेलै तंँ भोजनकें सेरायब उचित नहि।

हं,भैया।चलल जाय।

तीनू गोटा पतियानीमे बैसि क' जेना गामक गौंआरी भोज होय,भोजन क' रहल छथि।सब भोजन करैमे एकाग्र छथि।मौनकें तोड़ैत पुकारे बजला--,'की यौ देबु!केहन तीमन बनेलनि अछि भौजी'

भैया!एक नंबर‌!बहुत नीक।

मनोहर बजला- 'भैया एक बर्ष भ' गेल गामसँ एला।पहिल दिन माछ खेलहुँ अछि।पूरा तृप्त भ' गेलहुँ।की जबरदस्त माछ बनेलनि अछि भौजी!

'धन्यवाद भौजी।'

पुकारे देबुसँ पुछै छथि।की यौ देबु! अहाँक काज केहन चलि रहल अछि?

'भैया! काज ठीक चलि रहल अछि।सरदारजी नीक लोक छै मुदा दरमाहा बड़ कम दैत अछि।

पुकारे झा सांत्वना दैत कहलनि,'बढेबे करत।प्राइवेट नोकरी छै,नहि बढ़ायत तँ दोसर देखल जेतै।

पुकारे मनोहरसँ जिज्ञाशा प्रकट केलनि,'मनोहर अहाँ तँ शिक्षा लाइनमे छी।दीपककें कतहुँ नाम लिखाब'पड़त।से सोचियौ।गामक स्कूलमे तँ तीसरा क्लासमे पढ़ैत छलय। शिक्षा जगतक बात तँ अहीं फरीछ सँ बुझबै।की कोना हेतै से अहाँ देखियौ।

'हँ,भैया सोचैत छियै।आब तँ नबके सत्रमे नाम लिखेतै।एखन तीन मास  देरी छै।

पुकारे बजलाह-से बात तँ ठीक छै मुदा दिल्लीक स्कूलमे बड़ ने तामझाम छै यौ मनोहर।

'हँ,से बात तँ छै भैया। '

'एकटा  काज  करू।गामक स्कूल सँ दीपकक टी.सी मँगबा लेब। टी.सी पर डी.ई.ओ सँ काउन्टर साइन करायब नहि बिसरब।'

मनोहर कुमकुम दिश उन्मुख होइत कहैत छथि,' जबरदस्त माछ बनेलहुँ अछि भौजी।मायक हाथक माछ मोन पड़ि गेल।'

ओह!अपना गामक बड़की पोखरिक माछक स्वाद संसारमे कतहुँ भेटत।कथमपि नहि।अद्भुत्।मुदा दिल्लीयोमे एहन स्वदगर माछ। भैया कतयसँ ताकि अनने छलाह?बहुत स्वादिस्ट छल।हमरा एतुका बर्फवला माछ देखि क'माछ खयबाक इच्छे नहि होइये।एकबेर एकटा होटलमे माछ खयबाक लेल गेल रही एक कौर मुहमे उठा क' देलियै से भभक लागल  जे दोबारा कहियो माछ दिसन तकबाक हिम्मत नहि भेल।


भाग-6

हेलो मनोहर! हम देबु

हँ,देबु भाइ,की हाल -चाल

'सब ठीके कहक चाही मनोहर भाइ।कहलहुंहें जे कोनो दोसर काज देखियौ।एहि दरमाहा सँ काज नहि चलतै।सरदारजी तँ दरमाहा बढ़बिते नहि छैक।एहि सँ बेसी तँ हम गाममे ट्युशन कोचिंग सँ कमा लैत रही।

देखै छियै देबु भाइ,कोनो जोगार हेतै तँ तुरंत खबरि करब।

मनोहर भाइ!अपन समाचार कहु।

ठीक अछि देबु भाइ।हमरा अलगे कष्ट अछि।

देबु पुछलनि-"केहन कष्ट मनोहर भाइ?"

'की कहु देबु  भाइ! मैडम अपने बंगलाक बगलमे एकटा डेरा दिया देलक।हमरा आफिसक काज सँ हटा क' अपन नीजी सचिव बना लेलक अछि।आब भरि दिन जतय-जतय ओ जाइत छैक,संगे रहु।भोर नौ बजे सँ रातिक दस बजे तक रहय पड़यै।एको मिनटक फुरसति नहि।रवियोक' कोनो ने कोनो कार्यक्रम, पार्टी-सार्टी रहिते छैक।

ऐँ यौ। मनोहर भाइ !मैडम के धिया-पुता,परिवार  नहि छैक की?

नै यौ देबु भाइ! मालिकक  एकमात्र बेटी छै।विवाह भेल छै।घरवला कोनो विदेशी कंपनीमे नोकरी करैत छैक।सुनै छियै दुनू परानीमे पटरी नै बसै छै।आफिसमे कनफुसकी होइत रहैत छैक जे दुनूक आपसी मेलजोल ठीक नहि चलै छै।तलाक होब'वला छैक।

देबु बजला,' ओ तखन सम्हरि क' रहब मनोहर भाइ।अहाँ देखबा-सुनबा मे बड़ स्मार्ट छी तें कहलहुँ।ताहुमे हरियाणवी मौगी अछि‌।हरियाणाक गाय-महिंस सब बड़ कठमस्त, तेहने दुधगरि।जमनापारी नस्ल ओतहि के छैक ने।तहिना हरियणाक स्त्रीगण सबहक हाड़-काठ सेहो बड़ मजगुत।तेहन मेहनती।'

से तँ छैक देबु भाइ।मैडम थकै नहि छैक।हम तँ अकछा जाइत छी।भोर सँ दस बजे राति धरि खटिते रहैत छैक।कखनो चैन नहि।कहियोकाल कहत लगता है तुम थक गये हो ।तुम डेरा चले जाओ।

'देखियौ मनोहर भाइ! आर किछु नै कहब माय बापक एकलतुआ पुत छी से बचि क' रहब।'

'चिंता नहि करू देबु भाइ।हम बचले रहब'।

'चिंताक बात छैक मनोहर भाइ!मुदा आगाँ जे हेतै से नीके हेतै। मनोहर भाइ फोन रखैत छी।पलखति भेटलापर फेर बात करब।

नै,नै ठहरू  देबु भाइ,किछु आर बात करबाक अछि।

आफिसके फोन सँ करैत छी।सरदार ओहु लेल बिगरैत छै।

कहु ने मनोहर भाइ!

'देबु भाइ!गामसँ एना कतेक दिन भ' गेल से सोह अछि?'

'हँ,यौ पुरा बर्ष दिन भ' गेल।'

सएह कहलहुँ अछि हमसब कोनो गामो गमाइत जाइत रही तँ कारी बड़ेड़ी नहि होअ दियै।कतबो अबेर भ' जाय मुदा हमर सबहक राति धरि गामेमे बितैत छल।

हँ,से तँ छैक मनोहर भाइ।

भाइ!ताहि गामकें त्यागना बर्ष दिन भ' गेल।

देबु गामक स्मृतिमे हेरा गेलाह।एह! सोचैत रही जे किछु भ' जेतै गाम सँ नहि जैब।गाममे  डेयरी फार्म खोलब।खूब दूध उत्पादन करब।अपनो टाका कमायब आओर किछु लोककें रोजगार सेहो भेटतै।मुदा अपना बिहारमे किछु संभव नहि छैक।सबसँ बेसी तँ लोक नहि जीबय देत।जे पढ़ि लिखि क' महिंस पोसै छी।परिवारक लोकक अलगे क्वाथ।देखौ ने एतय लोक देबु कोन धरानी अपन गुज्जर क' रहल छथि।ओहो एसकर,जखन परिवार हैत तखन कोन अधापन बितत!

की भेल देबु भाइ ?अचानक कियै चुप भ' गेलियै?

'नै किछु, गामक पुरनका दिनसब मोन पड़ि गेल।'

हमर विचार सँ चलू एकबेर गाम सँ भ'अबैत  छी।

मनोहर भाइ! हम तँ सोचैत रही एकेबेर दियिबातीमे गाम जायब।मुदा अहाँ कहैत छी तँ चलू।सुनै छियै गाममे आम खूब फड़ल छै।टिकट के व्यवस्था करू मनोहर भाइ।भ' अबैत छी गामसँ।


भाग-7

'हेलो पुकारे भैया!'

'हँ,मनोहर की हाल चाल?

गोड़ लगै छी भैया।कहलौहें जे दीपक के एडमिशन के की भेलै?

यौ मनोहर!एखन धरि कहाँ किछु भेलयै।

से किछु सोचबै ने भैया।एकटा प्रिंसिपल हमर परिचित छथि।दिल्ली सरकारक स्कूल छैक‌।कहलनिहें जे एडमिशन भ' जेतै।रजिस्ट्रेशन शीघ्र करब' पड़त।अहाँक डेरासँ पांच किलोमीटर पर छैक स्कूल।स्कूलक बस ओतय धरि जाइत छैक। 

'हम काल्हि फोन करैत छी मनोहर।'

जी भैया,फोन रखै छी।

कुमकुम पुकारे झाक हाथमे चाहक कप दैत पुछै छथि।आइ बहुत चिंतित मुद्रामे छी। कोनो विशेष बात की?

हँ,कुमकुम।चिंताक बात तँ अछि।दीपकक एडमिशनक बिषयमे निर्णय लबय पड़त।

कुमकुम पुकारे झाक बातमे हँ,मे हँ मिलबैत कहलनि,से तँ लेबहि पड़त।

'कुमकुम!हम कैकटा प्राइवेट स्कूलमे आइ गेल छलहुँ।ओकर सबहक जे तामझाम छैक ताहिमे सकनाय बड़ मोसकिल छैक।बहुत डोनेसन मंगै छै।नीक स्कूलमे पचास हजार सँ डेढ़ लाख धरिक माँग छै।ताहिपर महीनवारी फिस तीन सँ पाँच हजार।तखन किताब ओकरे सँ लियौ।युनिफार्म, जुत्ता-मौजा सब ओकरे सँ लियौ।

'ऐ यौ प्राइमरी स्कूलमे पढ़बाक लेल एतेक डोनेसन!एतेक फिस! प्राइवेट स्कूलक लेल कोनो नियम कानून नहि छैक की?

कोनो नियम नहि छैक कुमकुम।जतेक पैघ-पैघ स्कूल छैक से कोनो ने कोनो नेताक छैक।जे नेताक नहि छैक से कोनो ने कोनो बड़का नेताकें पकड़ने छैक।चुनावमे ओकरा सबकें फंडिंग करैत छैक।ओ सब जे कहतै से करहि पडतै।

कुमकुम!हमर तँ विचार अछि दीपकक एडमिशन कोनो सरकारी विद्यालयमे  करबा दियै।घरपर नीक ट्युटर लगबा दियै।एतुका सरकारी स्कूलक हालत अपना बिहार सँ नीक  छैक।शिक्षकक बहाली प्रतियोगिता परीक्षाक आधारपर होइत छैक।नीक शिक्षक सब छैक।

कुमकुम कने निराश होइत बजली,किछु छैक मुदा छैक तँ सरकारिये‌।कतहु लिखबा दियौ।पढ़ैवला हेता तँ पढ़ि लेताह।बिना अर्थक मनोरथ बेकार छैक‌।

पुकारे झा कुमकुमकें सांत्वना दैत कहैत छथि,'शिक्षा शिक्षक दैत छथि‌। उँच-उँच मकान आ आरामदेह व्यवस्था रहने बहुत नीक पढ़ाइ होइत छैक से बात नहि।अहाँ मोन छोट जुनि करी।सब नीके रहतै।

कुमकुम पुकारे झाकें कहैत छथि।जतय होइ छै नाम लिखबा दियौ।बैसु नहि,लागि जाउ।फरवरी बीत रहल अछि।अप्रैल सँ नब सत्र आरंभ भ' जाइत छैक।

 हँ,हम आइये सँ प्रयासमे लागि जाइत छी।गाममे हम ऋषिकें फोन केने छलियनि जे गामक स्कूलसँ टी.सी.ल'क' डी. ई.ओ सँ काउंटरसाइन कराक'शीघ्र पठा दिअ।ऋषि कहलिहें जे भैया एहिमे किछु खर्चा लागत।डी.ई.ओ आफिसमे बिनु खर्चा के काज नहि हैत।कहि देलियनिहें जे खर्च लागत मायसँ ल' लेब मुदा शीघ्र काज दियौ।ओ आस्वस्त केलनि अछि जे भ' जायत भैया‌।

कुमकुम बीचमे टोन दैत बजली,'ऋषिकें कहलियनि आ नहि हैत।ऋषि सँ कोन काज नहि हेतनि।थाना होइ,ब्लौक होइ,अंचल होइ,जिलाक कोनो कार्यालय सब ऋषिक पैर त'र छनि।ओ तँ कहिते छथि 'आतुर काज दरब सँ होइ।'

'हेलो मनोहर!'

हँ,पुकारे भैया

कहलौंहें जे अहाँक भौजीक मोन सेहो मानि गेलनि। अहाँ दीपक के रजिस्टेशन सर्वोदय विद्यालयमे करबा दियौ।

मनोहर उतारा दैत कहलनि,भैया अहाँकें आब'पड़त।आवेदन-पत्र पर हस्ताक्षर अहीँक हैत ने।

जहिया  कहीं हम उपस्थित भ' जायब।

पुकारे भैया एहन करू अहाँ दीपक आओर भौजीकें सेहो संगे नेने अबियनु।भगवती चाहथिन तँ ओही दिन एडमिशन करबाइये देबै।

'मनोहर! मुदा टी.सी.गाम सँ एखन धरि कहाँ पहुंचलै अछि।

छोड़ू ने भैया। टी.सी.जखन एतै अहाँ जमा क' देबै।प्रिंसिपल के सेहो हम कालेजमे बहुत काज करबा दैत छियै।हमरा लेल एतबो नहि करता।हम एखने प्रिंसिपल सँ बात क'क'फोन करैत छी‌‌।

हँ,भैया बात भ' गेल।समस्या एकेटा अछि जे हमरा छुट्टीक बहुत अभाव अछि।प्रिंसिपल साहेब चारि मार्च क' एबाक लेल कहलनि अछि।एहन करू अहाँ तीनू गोटा चारि तारीख अर्थात् परसु आबि जाउ।दिल्लीक जे परिचय पत्र ,रासन कार्ड आदि बनबौने होयब सबटा नेने आयब।

मुदा मनोहर अहाँक बिनु रहने कोना हैत?

भैया! एहन करू अहाँ सब ठीक एक बजे स्कूलक गेट लग पहुँच जायब।हम आबि जायब।

चारि मार्च क' पुकारे झा आ कुमकुम अपन एकमात्र पुत्र दीपक के ल'क' ठीक एक बजे सर्वोदय विद्यालयक गेट लग पहुंच गेलथि।किछुए क्षण ठहरलथि ताबे मनोहर सेहो ओतय पहुँच गेलथि।

प्राचार्यक केबिनमे सबगोटा दाखिल होइत छथि।प्राचार्यकें सबटा बात कहलखिन।सबटा बात मनोहर पहिनहि क' नेने रहथि।प्राचार्य औपचारिकताक लेल एकटा आवेदन भरबेलखिन।

एकटा शिक्षिकाकें आदेशित करैत कहलखिन जे,'अहाँ एहि बच्चाकें एकटा टेस्ट ल' लियौ जे ई चारिम वर्गमे पढ़बाक योग्य अछि कि नहि।आधा घंटाक भीतर हमरा रिपोर्ट करू‌।

शिक्षिका दीपककें ल'क' एकटा दोसर कोठरीमे चलि गेलीह।दीपकें गणित और भाषाक साधारण प्रश्न सब पुछलखिन।

किछुए काल बाद शिक्षिका प्राचार्यक आगाँ एकटा कागज बढ़बैत कहलनि जे सर,बच्चा हिन्दी और गणित मे ठीक है।इंगलिश थोड़ा वीक है।लेकिन ये पकड़  लेगा।

प्राचार्य कागजकें देखैत मनोहर सँ कहलनि जे आवेदन पत्र जमा क' दियौ।गामसँ जखने टी.सी आबय पठा देब।नब सत्र दू अप्रैल सँ आरंभ हेतै।

'सर,ई छथि पुकारे झा,हमर गामक भाइ। हिनके पुत्र छियनि दीपक। बहुत नीक लोक छथि।हमर स्थानीय अभिभावक।आब इएह अपनेसँ भेट करताह।'

'कोनो बात ने।अहाँ मार्चक अंतिम सप्ताह या अप्रैलक पहिल सप्ताह मे भेट करू।किताबक लिस्ट आओर युनिफार्म आदिक बिषयमे सबटा समझा देब।

' धन्यवाद प्राचार्य महोदय।'

ठीक छै पुकारे जी आब अहाँसब जाउ।हमरा जकटा जरूरी मिटिंग करबाक अछि।


भाग-8

हेलो देबु भाइ!

हँ,मनोहर भाइ!की हाल-चाल यौ

हाल-चाल बड़ नीमन।टिकट भ' गेल।9 जून  क'गाम चलबाक अछि‌।दिल्ली सँ पटना सम्पूर्णक्रान्ति एक्सप्रेसमे।सुपरफास्ट गाड़ी छै।सब कहैत छै राजधानी जकाँ चलैत छै।

से बात तँ ठीक मनोहर भाइ मुदा पटना सँ मधुबनी जाइमे की  हालत हैत से सोचि क' देह सिहरि उठयै।बस सँ आठ घंटा लागत।रामहिलोरा झुलैत जैब।

हँ,देबु भाइ।हमरा बड़ ड'र होइत रहयै। जखन बस खाधिमे एकदमसँ झुकि जाइ छै।भरि रस्ता हनुमान चालिसा पाठ करैत रहैत छी।

से बात तँ ठीके मनोहर भाइ।'खाधिमे सड़क छै कि सड़कमे खाधि से कहब कठिन।की करबै!उपाय कोन।जन्मभूमि अछि।माता-पित छथि जेबाक तँ अछिये।बिहारक मुख्यमंत्री कखलिनहें बिहारक सड़ककें हेमामालिनीक गालसन चिक्कन क' देथिन।आब दिन दूर नहि छै ।'

'एबाक बेरक यात्रा मोन अछि ने देबु भाइ!'

हँ,यौ मोन अछि तें कहलहुँ जेना हुए रिजर्वेशन कराउ।रिजर्वेसन कंपार्टमेंटमे सेहो वेटिंगवलाक बड़ भीड़ रहैत छै।सबेरे सीट खसा क' सुति रहब नै तँ सब बैस जायत तँ उठबे नहि करत। के झगड़ा करय?

हं,एकटा बातक आर सावधानी राखय पड़त।स्टेशन सबेरसकाल चलि जायब।बिहार जायवला ट्रेनमे अपार भीड़ भ' जाइत छैक प्लेटफार्मपर।कयैक दिन पुलिसकें लाठी भाँजय पड़ैत छैक।

'से बिहार जायवला ट्रेनमे एना कियै होइत छैक देबु  भाइ। दिल्ली सँ तँ देशक सभ भागमे रेलगाड़ी जाइत छैक।आनठाम जाइवला रेलमे एना कहाँ होइत छै यौ।'

मनोहर भाइ!आधा दिल्ली बिहारीये सँ भरि गेल छै।की करौ लोक? ओतय कोनो काज रोजगाड़ छैहे नहि।जेहो किछु लोक खेतीबारी सँ जुड़ल अछि, रौदी-दाहीक मारल अछि। सबकें परैनी लागल छै।एकगोटक कंफर्म टिकट पर चारिटा वेटिंगवला तथा ओकरा सबकें चढ़बैवला बारह गोटा। बुझलियै ने आब।स्टेशन पर कियै एतेक भीड़ होइत छैक?

एकटा बात नहि बुझलियैक देबु भाई!

की ?

एतेक लोक अपन ड्युटी छोड़ि क' स्टेशनपर अरियातय लय कियैक जाइत छैक?

यौ सब अरियातय थोड़े जाइत छै मनोहर भाइ

तखन!

'ओ लोकनि अपना घर-परिवारक लेल मोटरी  पहुंचाबय जाइत छैक।'

' ओ से बात!'ओहि मोटरीमे की सब रहैत हैतै?

' ओहि मोटरीमे रहैत छैक साबुन,तेल,बिस्कुट,दालमोट,भुजिया,हार्लिक्स, नव कनिया सबहक लेल श्रृंगार प्रसाधनक सामग्री आदि।

ठीक छै देबु भाइ!मोटा चोटा तेयार क'लेब।बेसी समान नहि लेब।सबटा समान अपना  बेनीपट्टी-पुपरी बजारमे भेटिते छैक।


भाग-9

' थोड़ा घुसककर बैठिये न।'

' यौ! हम तँ अपन सीट पर बैठल छी।सीटपर तीनक बदला चारि गोटे पहिने सँ बैसल छी।

'हमरा भी टिकट है इसलिए न बोले हैं।

'तँ की बुझा रहल अछि हम बिना टिकट के छी।

'ई  देखियौ हमर टिकट,दू आदमीक टिकट।एक नं पर हमर नाम देबु कामति ,दू नं पर हमर संगी मनोहर झा‌।'

की कोनो शंका! हम दुनू गोटा पटना धरि जायब।'

'नहीं  सो नहीं बोले हैं।हमको भी आरा तक जाना है।टिकट कंफर्म नहीं हुआ।'

'अच्छा से  कहु न।गुंजाइस होइये तँ सुतय'बेर तक बैसु।जखन सुतैक बेर हैत बिचला सीटवला सीट खोलबे करत।उपर-नीचा हमसब छी।

ताबे सामनेवला सीटपर झगड़ा बजरि गेलै।एकटा यात्री अपना सीटक लग एला।सीटक नीचाँ समान पहिनेसँ ठसाठस भरल छल।

'सीट के नीचे किनका  सामान है?'

कियो बजबे ने करय।हारि क'सीटवला व्यक्ति सीटक नीचाँ सँ समान निकालय लगल।तखने उपरका बर्थपर बैसल एक आदमी कुदल।

'सामान क्यों फेक रहे हैं?'

 ये मेरा सीट है।मैं अपना सामान कहाँ रखूँगा?

पूरा रेल ही आपका है।

नहीं ये दो सीट है मेरा।

सर,टिकट एकेटा कंफर्म भेलै?की करितियै।ससुर मरि गेल छथिन दुनू गोटाकें जायब जरूरी अछि।

ठीक छै चलू।हमर मात्र इएह दूटा समान अछि राखय दिअ।

कहुना क' ओ यात्री अपन सामान रखलनि।हुनका सीटपर पहिने सँ तीन गोटा बैसल छै।कहुना क' बैसला।


भाग -10

मनोहर भाइ छी!

हँ,देबु भाइ।आउ!आउ

बहरायब नै

हँ,यौ आउ ने चलै छी।

'गोड़ लगैत छी काकी।'

खूब नीके रहु देबु।नीकेना  छलहुँ ने यौ।

हँ,काकी ठीक छलहुँ।अहाँस ठीक छी ने।

हँ,हमहुँ सब ठीक छी।बैसु चाह पिब लिअ।

आउ देबु भाइ। एतहि आउ।

ओसारा पर राखल कुर्सी पर दुनू गोटा बैसि गेलाह।

मनोहर मायक हाथसँ ट्रे ल' लेलनि।

चाहक कप देबु कें पकड़बैत मनोहर कहैत छथि।

'देबु भाइ चलु ने कनि गाम दिश सँ घुरि अबैत छी।

हँ,चलू।हमहुँ इएह सोचि क' विदाह भेल छी।

हमर तँ विचार रहय काल्हि भोरमे  जाइ  जे निकलब तँ कनि गाछियो दिश सँ भ' आयब

मुदा जखन अहाँक विचार अछि तँ चलू भ' अबैत छी।एखन चलू लक्ष्मीनारायण  मंदिर  दर्शन क' अबैत छी।मुदा एकटा बातक ध्यान राखब।चौक परहक गोलैसीमे नहि धरायब।दर्शन करब आओर छहर दिश निकलि जायब।

'गाममे किछु नहि बदलल अछि मनोहर भाइ।सब ओहिना अछि।एक बर्षमे बदलबे की करत।'

'देबु भाइ पचीस बर्षमे की बदलि गेल से तँ कहु ?'

पचीस बर्षमे तँ बदलल अछि ।

कथी?

बिहारक सत्ता।पहिने निष्कंटक कांग्रेस राज करैत रहय।आब नया पार्टी जनता दल राज क' रहल अछि।

हँ,से बात तँ ठीक कहलहुँ मुदा सत्ता बदलला सँ की बदललै?

सब ओहीना के ओहिना।

सरकार बदलै छै।व्यवस्था तँ ओहने छै।

सत्तापर बहिरा करैत सब बैसल अछि।कुंडली मारि क।' लोकक खून चुसि रहल अछि।

छोड़ू ई सब बात।चलू भगवानक दर्शन करी। अपना गामक ई भव्य मंदिर।मंदिरक सोझाँमे पोखरि‌।पोखरि सँ सटले अपना सबहक स्कूल।जनै छी देबु भाइ जखन दिल्लीक ट्रैफिकमे फँसल लोकसभकेँ बिषाह कार्बन डायआक्साइड पीबैत,हँफिआइतअपसियाँत महानगर दिल्ली  बीमार कुकुर जकाँ हकमैत रहैत अछि।तखन मोन पड़ैत अछि अपना गामक ई मंदिर आओर कमलाकातमे बनल ई उँचगगर छहरि।

'की यौ मनोहर कहिया एलहुँ?'

'आइ भोरमे एलहुँ काका।'

'सब कुशल-मंगल ने काका।

हँ यौ ।अहाँ सब ठीक तँ हमहुँ सब ठीक।कतय चललहुँ अछि?

मंदिर जा रहल छी काका,दर्शन करबाक लेल।

जाउ।जरूर जाउ।

अच्छा!एकटा बात कहु।दिल्लीमे  कोन काज करैत छी।

काका!हम एकटा प्राइवेक कालेजमे एकाउंटेंटक काज करैत छी।

वाह!बड़-बढ़ियाँ

तो हौ देबु!

काका हमहुँ एकटा प्राइवेट कंपनीमे  एकाउंटेंटक काज करैत छी।

बड़ बेस।

काका अर्थात् जीवन झाकें गोड़ लगैत दुनू गोटा आगाँ बढ़ि गेलाह।

जीवन झा चाहक एक सुरूक्का मारैत विदेशी भगत कें कहैत छथि।

ऐँ हौ विदेशी ! जे दिल्ली जाइत अछि सब आफिसरे भ' जाइत अछि।

हँ,से तँ ठीके कहलियै जीबन काका।दिल्ली सँ जे आएत तँ जीट-जाट, ने देखू।की कहु ?हमरा टोलक तँ अलबत्त लीला छैक‌।

'से की हौ विदेशी?'

हमरा टोलमे तँ जे छौंड़ा दिल्ली सँ अबैत अछि से सभ सँ पहिने तँ अपन भाषामे  बाते नहि करत।काल्हि हमरो टोलमे दू-चारिगो छौंड़ा सब दिल्ली सँ आयलए ।एकटा हमर ज'न अछि रविया।ओकर बेटा सेहो गेल छलै दिल्ली। परसुए एलयै।काल्हि गेल रही धरानटोल। भोरे-भोल ओ छौंड़ा भेटल।कहलक गोड़ लगते हैं बाबा।हम पुछलियै 'ऐं रौ! ई कोन भाषा भेलै?अपन भाषामे बाज ने।'

'उतारा दैत ओ छौंड़ा कहलक- दू साल न हो गया बाबा।भाषा थोड़ा-थोड़ा भूल न गये हैं।'

ऐं रौ बीस बर्षक तों भ'गेल छलहें तखन तों दिल्ली गेलें आ दुइये  बरखमे तों भाषा बिसरि गेलहीं।

हौ,वीदेशी!गोड़ लगलकह तँ आशीर्वाद  देलहक की नहि।

ऐह!केहन बात करैत छी जीबन काका।आशीर्वाद ककरा लेल रखबै।दिल्ली जाय लेल मासुल सेहो हमहीं देने छलियै।बात कहलहुँ जे हमरा एतुका लोक दोसराक छिछा उतारबा मे कतेक ओस्ताद अछि।

मनोहर भाइ!चलू छहर कात सँ घुमि आबी।

हँ,देबु चलू हमहुँ इएह कहैक लेल  रही।

'देखियौ मनोहर भाइ सुरूज तेज गतिये अपना घर दिश प्रस्थान क' रहलाह अछि।'

'देबु भाइ!सुरूज नहि प्रस्थान क' रहलाह अछि वास्तवमे सुरूज तँ छथि ठामक ठामहि।एकरा गोधुलिबेला कहैत छैक।हे ओमहर देखियौ कमलाकात सँ चराउर क'क' गाय महिंसक हेंड़ सब अपन बथान दिश  घुरि रहलए।पाछाँ -पाँछा चरबाहा सब सेहो आबि रहलए। कमलाक धारमे सुरूजक रक्तिम किरण पसरि गेल अछि।बीच कमलामे एकटा नाह सेहो देखा रहल अछि।किछु लोक ओहिपर सबार अछि।

 केहन अनुपम दृश्य अछि,अद्भुत् छटा।'

'मनोहर भाइ!पछिला साल भरि सँ दिल्लीमे छी कहियो एहन  दृश्य अभरल।'

'एकदम नै देबु भाइ।मोन सब दिन हलचले रहल।दिल्लीमे भोर सँ साँझ धरि सब भगिते रहैत अछि।हमहुँ सब समयक पाँछा पड़ाइत रहैत छी। मुदा समय ककरो आइ धरि पकर' देलकै।समय अपना गति सँ चलैत अछि‌।लोककें लगैत छैक जे हम समयक संग चलि रहल छी वा समयसँ आगाँ चलि रहल छी।'

'मनोहर भाइ!नदी तँ दिल्लियो मे छैक।यमुना सन महत्वपूर्ण नदी।मुदा कहियो ल'गसँ यमुनाकें निहारबाक अवसर कहाँ भेटल।कहियो एहन विचारो उत्पन्न नहि भेल जे यमुनाक कात टहलैक लेल जाइ।जहिया-जहिया यमुनाक कछेर सँ गुजरैत रही,यमुनामे प्रवाहित गंदगी तथा कछेरपर पसरल दुर्गंधयुक्त कचरासँ मोन कोनादन करय लगैत रहय।'

'देबु भाइ!ओ बिचला बाधमे एकटा मकान देखा रहल अछि।ओ घर तँ साल भरि पहिने नहि रहैक।हाले फिलहालमे बनल बुझा रहल अछि।'

'हमरो नै बुझल अछि मनोहर भाइ ।'

'गोड़ लगै छिय देबु भैया।'

'खूब नीके रह' धीरज।'

'कहिया एलियै भैया?'

हम आइये भोरमे एलिय ।आर सब ठीक छ ने हौ।पढ़ाइ-लिखाइ चलै छ ने हौ।

'हँ,पढ़ाइ तँ चलिते हय भैया।मुदा की चलतै!बी.ए मे नाम लिखेला पाँच बरिस भ' गेल।तेसर सालक परीक्षा एखनतियो बांकिये हय।'विचार हय जे बी.ए क्लियर क' ली तखनि हमहुँ कतहु बाहर चलि जाइ।बाबू रोज बात कहैत रहैत छथि।जे जीवन भरि पढ़बे करब'तँकमेब'कहिया‌।तोहर बतारी सब कमा क' ढेरी कयने अछि।'

नै,नै एना सोचबो नहि करह।बी.ए  पास अवश्य क' लैह।शिक्षा कहियौ बाम नहि जाइत छैक।काज-राज तँ जीवन भरि चलबे करतै।पढ़ाइ बादमे नहि हेतह।की करबहक एतुका सरकारक तँ लीले अपार छै।'पढ़ाइ के तँ जे करयै।समय पर परीक्षा करबा देतै तँ लोक रोजी रोजगाऱमे लागि जैत।'

भैया हमर बैचमेट सब जे दिल्ली विश्वविद्यालयमे पढैलेल चलि गेल से सब एखन पी.जी क' रहल अछि।हमसब बी.ए मे लटकल छी।

'की करबह।ई सब जन्मक अभिशाप अछि।जेहन प्रान्तमे जन्म लेने छी भोगहि पड़त।

'ऐँ हौ!धीरज ई बिचला बाधमे  की बनलयै?' ओतय तँ बड़का परती छै ने हौ।लोक सब माल-मवेशी चरब' जाइत अछि ने ओतय।

हँ,भैया सही कहलहुँ।ओतय चरबाहा विद्यालय बनलयै।ओहिमे‌ चरबाह सब पढ़तै।चरबाह सब गाय महिंस चरेबो करतै आओर पढ़ाइयो करतै।'

'वाह!ई तँ नीक बात।मुदा जे स्थापित स्कूल सब अछि ओकर हालत तँ खस्ता छै।ने स्कूलमे मास्टर, ने‌ भवन।अपने गामक स्कूलमे हम सब पढ़ैत रही तँ बारहटा मास्टर रहथि।आब चारिटा छथि।भवनक हालति सेहो जर्जर अछि आ सरकार एहि च'रमे स्कूल बना रहल अछि।गज़बे लीला छै।'

देबु भाइ'!

हँ,मनोहर भाइ।

'कहलौहें जे ई चरबाहा विद्यालयक बिषयमे हम दिल्लीक अखबारमे पढ़ने रही।योजना बेजाय नहि छैक जे चरबाह सब गायो महिंस चरायत आ पढ़बो करत।

'गैया-बकरी चरैत जाय।मुनिया बेटी पढ़ैत जाय।'

देखैत रहियो मनोहर भाइ की होइत छैक।ई सरकार शिक्षाक प्रति संवेदनशील अछिये नहि देखिये रहल छी जे गामक एकटा होनहार नौजवानक स्वर्णिम दिन कोना स्नातकक एटका डिग्री लेब'मे बीत रहल छैक।डीग्री भेटतै तखने ने कोनो आगाँक दुआरि फुजतै।कालेज कैम्पससँ पढ़ाइक वातावरण बिल्कुल समाप्त भ' गेल छैक।परीक्षा प्रणाली पूरा ध्वस्त।सत्र तीन साल बिलंब सँ चलि रहल अछि।सत्र हेबाक चाही 89-92 ,परीक्षा चलि रहल अछि 86-89।जेना मोन हुए परीक्षा दियौ।तीन घंटाक बदलामे नौ घंटामे उत्तर-पुस्तिका जमा करू।अपने लिखय नै अबयै तँ दोसर सँ लिखबा लिअ।कोनो बन्हेज नै।कोनो‌ परहेज नै।'





Sunday, December 28, 2025

कथा कीर्तिनाथक


सम्प्रति बहुत दिनक बाद कथाक कोनो पोथी पूरा पढ़ि जेबाक इच्छा भेल से डा.कीर्तिनाथ झाक कथा संग्रह'कथा कीर्तिनाथक' पूरा पढ़लहुँ।संग्रहमे २० गोट कथा संकलित अछि।एक पांतीमे कहल जाय तँ कथा सब पढ़बामे मनलग्गू अछि। हिनक किछु कथा सम्प्रति मैथिलीमे लिखल जा रहल कथा सभसँ फराक  स्वाद दैत अछि कारण अछि हिनक सैनिक पृष्ठभूमिमे रचब-बसब तथा हिनक घुमक्करी जीवनवृत्ति।जाबे धरि अहाँ संसारकें लगसँ नहि देखबैक संसार भरिमे पसरल मानव समुदायक जीवन संघर्षक अनुभव नहि करबैक साहित्यमे प्राणतत्व भेटब मोसकिल।एहिसँ पूर्ब हिनक यात्रा संस्मरणक पोथी 'लोहना रोडसँ लासबेगस' पढ़बाक अवसर भेटल छल। अपनहुँ हम यात्रा पसिन लोक छी से हिनक संस्मरणात्मक  पोथी  रोचक लागल छल।हमरा ई ज्ञात नहि छल जे पहिनहुँ हिनक एकगोट कथाक पोथी प्रकाशित भेल अछि।एहि पोथीसँ सूचना भेटल जे 2005 ई.मे हिनक पहिल कथा संग्रह 'किछु पुरान गप,किछु नव गप' प्रकाशित भेल छनि। अर्थात ई हिनक कथा संग्रहक दोसर पोथी भेलनि।एहि कथा संग्रहकें पढ़लाक बाद ओहो कथा संग्रह पढ़बाक इच्छा भेल अछि।



संग्रहक पहिल कथा'अब्बास अली बताह छथि? संवेदना कें छुबैत अछि।अनंतकालसँ देशक सीमा-सरहदक लेल होइत झगड़ा-झंझटमे  सीमा परहक गाम -शहरक लोकक जीवनक बहुत मार्मिक चित्र कथाक माध्यमसँ सोझा आयल अछि। आमजनक कोन कथा युद्धमे लड़ैवला सैनिकक की दुर्दशा होइत अछि से कथा बहुत फरीछसँ अपन बात कहैत अछि।जहाँ धरि कथाक शील्पक बात कही तँ आरंभ तँ लागल जे हिनक कोनो संस्मरण पढ़ि रहल छी मुदा जेना-जेना कथा आगाँ बढ़ैत अछि अब्बास अलीक दशासँ पाठक अवगत होइत अछि, लोक संवेदनाकें मजगूतीसँ स्पर्श करैत अछि कथा।दू गोट महत्वपूर्ण युद्ध लड़ैवला जाहिमे एकटा विश्वयुद्ध सेहो एकटा सैनिक कें अपन पेंसनक लेल आजीवन संघर्ष कर'पड़ैत छैक।अंतमे अपन पेंसन बुककें जुमा क'सयोक नदीक तेज धारमे फेकि दैत छथि।एकटा अद्भुत् कथा अछि ।एहन कथा कियो सैनिके लिखि सकैत अछि।कथाक संग पूरा न्याय केलनि अछि लेखक।



संग्रहमे एकटा कथा अछि समाङ।समाङ कथाकें दू ढंग सँ देखल जा सकैत अछि पहिल ई स्मृतिक कथा थिक।एखन भारतमे बहुतो भाषामे नास्टेलाजिक कथा सब लिखल जा रहल अछि मुद एहि कथाकें गाछक प्रति प्रेम ओ पर्यावरणक प्रति चिंताक कथा सेहो कहल जा सकैत छथि।कथाक पात्र दुखमोचन स्मृतिमे बसल नेनपनक ओ  सबटा  बात साझी करैत छथि।सिनुरिया आमक गाछक स्थानपर खाधि देखि दुखमोचन विस्मित होइत छथि! ई तँ नियति छै।मनुक्खो मड़ैत छैक,गाछो सुखाइत छैक मुदा चिंताक बात ई जे आइ तथाकथित विकासक लेल रहरहाँ  काटल जा रहल गाछ बहुत सीदित करैत छैक चाहे वो सड़क बनेबाक  लेल काटल जाय वा नहरि खुनेबाक लेल।एकटा कथा अछि 'गपक भुखलि'।गामोमे लोक कतेक एकाकी भय गेल अछि।गामोक लोकक  जीवन सेहो आब मोबाइलमे ओझरा गेल छैक।कथामे एकटा संवाद छैक,"बाबी की कहु ,आब की छोटका,आ की बड़का सबहक घरमे चाउर दालिसँ बेसी डाटाक खर्च छै।देखियौ ने टोल पर।"मनुक्ख रहत तँ मनुक्खे लग मुदा आबक जे समाज अछि  ओतय लोक मनुक्खसँ बेसी  निकटता इलेक्ट्रानिक उपकरण लग पबैत अछि।चिंता स्वाभाविक अछि।

संग्रहक अनेक कथामे  वर्तमान मिथिलाक दशा -दुर्दशाक चित्रण तँ अछिये संगहि मिथिलामे जल प्रबंधनक अव्यावहारिक तरीकाकें सेहो चित्रित करबाक कथाकार प्रयास कयलनि अछि।एकटा कथा अछि'बान्हकेँ ढाहि दे'।2008ई.मे कुसहामे जे कोसीक बान्ह  टुटलै ताहि विभिषिकाक जीवंत ओ मार्मिक चित्रण कयलनि अछि लेखक।कोसीक बान्ह वास्तवमे बहुत अवैज्ञानिक तरीकासँ बनाओल गेल अछि,ताहुपर बान्हक उचित देखभाल नहि भ' रहल अछि।यदि समय रहैत सरकार ध्यान नहि देथिन तँ कुसहा एहन त्रासदी फेर भ' सकयै।कथाक पात्र पञ्चमणि जे बान्हक निर्माणमे सहयोगी छलाह से कुसहाक त्रासदीसँ विक्षिप्त भ'गेलाह आओर बजैत रहैत छथि'ढाहि दे बान्हकेँ,ढाहि दे! ई बान्हे सब फसादक जड़ि छी!!

एकटा सुन्दर कथा अछि ' गंगा कातसँ सिन्धुक कछेर धरि'।वास्तवमे ई मिथिलासँ पलायनक कथा अछि।ई मात्र कथा नहि  मिथिलाक जन-जनक व्यथा सेहो अछि।बी.ए पास सुर्युकें मजदूरी करबाक लेल लेह-लद्दाख जाय पड़ैत छनि।से सम्प्रति एकटा सुर्यूक कथा नहि मिथिलाक लाखो सुर्यू पेटक खातिर लेह,कारगिल,आसाम ,पंजाब,महाराष्ट्र,गुजरात ,दिल्ली धयने छथि।अथक परिश्रम करैत छथि तथापि यदा-कदा  स्थानीय राजनीतिक कारणें हुनका सबकें अपमानित,प्रताड़ित होबय पड़ैत छनि।कथा सुर्यूक संघर्षक संग लद्दाखी लोकनिक जीवन संघर्ष,धर्म ओ संस्कृतिक  ईर्द- गिर्द घुमैत अंतमे प्रेम कथामे बदलि जाइत अछि।सुर्यू आ लामोक प्रेम कथाकें बहुत रोचक बना दैत अछि।एकटा अत्यन्त सफल कथा अछि।शेफाली,फूरपरासवाली आ हम शीर्षक कथामे लेखक राजकमल चौधरीक कथा सबकें पड़ताल करबाक चेष्टा कयलनि अछि।तहिना एकटा आर कुंती सेहो मार्मिक कथा अछि।

संग्रहक प्राय:सब कथा पठनीय अछि।हमरा जनैत कथा आओर उपन्यासक लेल पठनीयता सभसँ बेसी जरूरी तत्व अछि।पठीनयता तखने होयत जखन ओहिमे कथातत्व विद्यमान रहत।एतय हम संग्रहक किछु आर कथाक उल्लेख करय चाहब।एकटा कथा अछि'अहाँ आउर नहि बुझबै' ई कथा कोरोना महामारीक संकटक समयक चित्रांकण करैत अछि।कोरोना महामारीक भयसँ आक्रांत लोक कोना महानगरसँ गाम दिस पड़ाय लागल। कहानीक अंत बहुत मार्मिक अछि।भारत गामक देश अछि गामक रहैवला ग्रामीण लोकनिक जीवन शैली महानगरीय जीवन शैलीसँ फराक होइत अछि।गाममे एखनो संवेदना बाँचल छैक।गाममे अपनत्वक बोध होइत छैक।शहरमे सब किछु व्यावसायिक छैक।अपन कहबा लेल शहर लग कोनो शब्द  नहि बाँचल छैक।कोनो व्यक्ति जखन कोनो महानगरकें छोड़ि दोसर महानगर जाइत अछि ओकरा कोनो विशेष फर्क नहि बुझाइत छैक।ओहने अपार्टमेंट,ओहने सड़क ,ओहने मौल प्राय:सब किछु एकरंगाहे।मुदा गामक एक-एक वस्तुसँ गामक लोक भावनासँ जुड़ल रहैत अछि तेँ कोरोना संकट एलापर गामक लोक नगरसँ गाम दिश पड़ाइत अछि,जखन कि बिमारीसँ बचाव ओ उपचारक बेसी व्यवस्था नगरमे छैक मुदा नगर गामक लोककें अपनत्वक भरोस दियेबामे असफल रहल तेँ ने एकटा गमैया लोक शहरूआ लोककें कहैत छनि अहाँ आउर नहि बुझबै। 

संग्रहक अंतिम दुनू कथा 'सबतरि  बिहारे छैक'आओर 'चर्चित' हमरा कथासँ बेसी व्यंग्य बुझायल।एहि दुनू कथामे कथातत्व कम मुदा व्यंग्य अधिक छैक।विशेषकय  चर्चित कथामे तँ मैथिली साहित्यमे सम्प्रति जे सेटिंग-गेटिंग के खेल चलि रहल छैक तकर जीवन्त चित्रण केलनि अछि लेखक।

पोथी पढ़बामे हमरा बहुत नीक लागल।एतेक तँ हम नीश्चित रूपसँ कहि सकैत छी जे पाठक लोकनि पढ़तातँ नीक लगतनि।कथाक माध्यमसँ समकालीनताक बोध हेतनि।देश दुनियाँ सँ अद्यतन हेताह।कथा सबहक भाषा-शैली रोचक अछि।आश्चर्यचकित करैवला बात ई जे लेखक अनेक दशकसँ  मिथिलासँ दूर रहै छथि तथापि हिनका लग खाँटी मैथिली शब्दक पर्याप्त भंडार छनि,तकर भहुत सम्यक प्रयोग कथा सबमे केलनि अछि।शब्दक एहन विलक्षणता सँ प्रयोग कथाक सौन्दर्यकें चारि चान लगबैत अछि।बधाइ डा.साहेब

Friday, September 26, 2025

जे.जे. कॉलोनी: भाग ४

 


भाग ४ 

देबु मनोहरसँ पुछलनि-

'मनोहर भाइ! की भेल?'

देबु!अहाँ कहु ने की भेल?


'अहुँ तँ छी पक्का मैथिल ने  सोझ मुहें उतारा नहिये ने देब ।'


'ताहिमे कोनो सक ! से तँ छी मैथिले ने।'


'देबु बजलाह! हमर बात सकारात्मक अछि मनोहर भाइ।सेठ कहलक -ए कल सुबह नौ बजे तुम कोठी पर आ जाओ।कार्ड देलकए


हौजखासमे छैक ओकर कोठी।'


मनोहर देबुसँ  पुरक प्रश्न पुछैत कहै छथि- 'काज की देत?'


मनोहर भाइ!एकाउण्टक काज लेल बजौने छल तँ एकाउण्टेक काज ने देबाक चाही।


'सेठ कहलकए तोरा कम्पुटर खीख'पड़तौ।इहो कहलकए जे हमर आफिसक लोक तोरा कम्पुटर सीखा देतौ।


मनोहर देबुक बात सुनिक'कहलनि जे अहाँक तँ  पक्का बुझू।


अहाँ के की भेल मनोहर भाइ? से तँ कहु


की हैत देबु भाइ?साक्षात्कारमे बहुत गोटे जुटि गेलै।पाँच गोटेकें दोबारा साक्षात्कारक लेल बजेलकै अछि ताहिमे हमरो बजेलक


अछि।मालिकक बेटी छै सबटा कर्ता-धर्ता।


कोन कंपनी छै?


कंपनी नै छै देबू भाइ।प्राइवेट कालेज छै।बहुत स्टाफ छै।हमर सबहक साक्षात्कार मैनेजर लेलक अछि।फाइनल  साक्षात्कार मैडम


लेतै।


भोरे सबगोटे संगे चाह पिबैत रहथि से पुकारे झा देबू आओर मनोहर सँ पुछि देलखिन जे अहाँ सब खाली बौआइते छी कि किछु


परिणामो भेट रहल अछि।


मनोहर पुकारे झाक प्रश्नक उत्तर दैत कहलनि -


भैया!हमरा एकटा काज भेट गेलए। 


पुकारे झा-कोन काज?


मनोहर उत्तर दैत कहलनि- भैया एकटा प्राइवेट कालेज छै ताहिमे हमरा क्लर्क  के नोकरी भेट गेल।आइ चिट्ठी सेहो द' देलक।काल्हिसँ


काजपर बजेलक अछि।


बहुत नीक,हमर शुभकामना अहाँकें।पढ़ल लिखल छी तँ काजो तेहन भेट गेलए‌।संकट एकेटा छैक जे दिल्लीमे  पढ़ल लिखलकें सेहो


बड़  कम दरमाहा दैत अछि।


मनोहर पुकारे झाकें उत्तर दैत कहलनि-करबै की भैया! उपायो तँ कोनो नै छै।


देबू अहाँकें  की भेल यौ!


भैया हमहुँ दूठाम इंटरव्यू देलियै अछि।मुदा एखन कतहुँ फाइनल नै भेल अछि।


'ठीक छै,प्रयास जारी राखू।


'पुकारे भैया!एकटा सेठ आइ कोठीपर बजेने छल।बातचीत सब ठीक भेलै।मुदा पुछलक  जे तुँ कतय के रहेवला छें?


जखने कहलियै बिहारक छी। ओ किछु सुनबाक लेल तैयार नहि भेल।एकेठाम कहि देलकै जे तुँ जो,हम बिहारीकें नहि राखब।'


पुकारे सांत्वना दैत कहलनि -कोनो बात नै छै।चिंता नहि करू।काल्हि हमरा संगे चलू।एकटा पंजाबी सिक्ख अछि ,हमरा बड़ मानयै।


दोस्ती जकाँ भ' गेल अछि।ओकरा कैकटा प्लाइउड के फैक्ट्री छैक।ओकरा सँ चलिक'बात करैत छी।


देबू पुकारे झाकें कहलनि ठीक छै भैया जेना कही।


काल्हि हम काजपर सँ एक बजे आबि जायब।हम मंगल दिन क' एके बजे तक काज करैत छी।मंगल व्रत रहयै ने।साँझमे कनाट


प्लैसवला हनुमान मंदिर जाइत छी।एतहि पंजाबीबाग मे सेठक आफिस छै‌।पहिने सेठ सँ भेट करबै फेर हनुमानजीक दर्शन करय


चलब।


बिहान कार्यक्रमानुसार पुकारे झा आ देबू कामति गेलाह पंजाबी सेठसँ भेट करय।


पुकारे झा सेठ के अभिवादन करैत कहलखिन-सत श्री अकाल सरदार जी 


सरदारजी- सत श्री अकालजी।


'कैसे हो झाजी?'


पुकारे झा-ठीक हूं सरदार जी।


सरदारजी-कैसे आना हुआ जी?


सरदारजी! ये हैं देबू।मेरे गाँव से आये हैँ।पढ़े -लिखे हैं, अपने फैक्ट्री में कोई काम दे देते इनको।यही निवेदन करने आया हूँ।


सरदारजी-किता पढ़ा है जी?


देबू- बी काम तक पढ़े हैं।


ठीक है झाजी!इसे कल भेज दो। हम एकाउटेंट को बोल देते हैं,इससे वे बात कर लेंगे।फिर जैसा होगा  देखते हैं‌। आप आये हो कुछ


तो होगा ही।आदमी तो पक्का है न जी।


आप निश्चिंत रहो सरदार जी।


बिहान देबू सरदिरजीक फैक्ट्रीपर गेलाह।


एकाउटेंट किछु पुछताछ केलकनि फेर कहकनि-जे आज से ही कामपर लग जाओ।चलो मेरे साथ।कुछ काम समझा देते हैं।

Wednesday, September 10, 2025

जे.जे. कॉलोनी: भाग २ और भाग ३

                 

              

भाग २

साँझ पड़ैत देरी  पुकारे झा आओर हुनक संगी सभ रतुका बुतातक आटा,अल्लू-पियाजु आओर किछु हरियर तीमन- तरकारी नेने डेरापर जुमि गेलाह।

अबिते मातर  मनोहर आओर देबूक हालचाल लेखिन।

'की यौ मनोहर! केहन रहलै अजुका दिवस।दुनू गोटा आराम केलहुँ ने।

हँ,भैया  रेलक झमारल रही से खूब निन्न भेल।दुनू गोटा खूब आराम केलहुँ।

मनोहर !तखन जाउ नीचाँमे मदर डेयरीक दोकान छै एक लीटर दूध नेने आउ। पहिने एक कप गरमागरम चाह भ' जाय। तखन गामक गपसप।हे लिअ ई टाका।

'ठीक छै  भैया।'

मनोहर दूध ल'क' आबि गेलाह-' हे लिअ भैया दूध'

सबगोटा हाथ पैर धो लिअ।हम चाह बना रहल छी।-पुकारे झा बजलाह।

पुकारे झा देबू सँ पुछलखिन-'की यौ देबू !अहाँ किछु बजैत नहि छी।

सब अपने गाम घरक लोक सब छथि।दू तीन गोटे अपने पड़ोसिया गामक छथि। दू गोटे  दोसरो जिलाक छथि।

देबू उतारा दैत कहलखिन-, नै भैया एहन कोनो बात नै छै।अहाँ छी तँ हमरा सभकें बहुत बल भेटल अछि।

पुकारे झा सभक हाथमे चाहक गिलास दैत कहलखिन- भाइ लोकनि! ई दुनू गोटा मनोहर आओर  देबू हमर गौंवा छथि।उमेरमे दुनू  गोटे छोट छथि तें भैयारी इलाकामे छोट भैयारिये भेलाह। दुनू पढ़ल-गुनल छथि।पढ़ले नहि छथि बहुत व्यवहारिक छथि,सामाजिक छथि।एहन युवा सबहक लेल हमरा मोन मे बड़ इज्जति अछि।

देबू आओर मनोहर दिश ईसारा करैत पुकारे झा बजलाह-

हे ई छथि कामेश्वर भगत ,हिनक घ'र बरदेपुर छनि।ई भेलाह नबोनाथ झा ,हिनक घर भेलनि हरिपुर मालटोल।ई छथि कमलेश सिंह हिनक घर भेलनि नरार।आओर ई छथि सुधीर पासवान घर छनि बेलमोहन।ई छथि गुरशरण कामति घर भेलनि सुपौल जिला आओर ई छथि गोरख राय घर छनि मानिक चौक सीतामढ़ी।

'फेर पुकारे झा बजलाह!एकदम मिझ्झर छी हमसब।गामक भोजक डालना बुझू।'

 चाहे पीबैत -पीबैत पुकारे झा देबू  आ मनोहरसँ गामक गपसप करय लगलाह‌।गप बड़ीकाल धरि चलैत रहलै।


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भाग ३

पुकारे झा देबु सँ पुछलनि-' देबु! गाम घरक हाल-चाल कहु!'

केहन समय-साल बीत रहलए मिथिलाक?

  देबु उतारा दैत कहलनि- 'गाम घरक  हाल -चाल  नीक नहि अछि भैया! '

 पछिला  पांच बर्षसँ नीकसँ धान नहि उपजल अछि।दू बर्ष बाढ़िक छछकालमे सबटा जजाति दहा गेल।तीन बर्षसँ पानिए ने ठीकसँ भ' रहल अछि। अपना ओतुका मुख्य जे फसिल छल धान से प्राय: नहिये जकाँ उपजि रहल अछि।तखन  दमकल- बोरिंगसँ  जेना तेना जे किसान रोपनी  क' लयै तँ किछु ने किछु उपजिये जाइ छै। मुदा रब्बीक फसिल धरि नीक उपजयै। मोटामोटी ई बुझू भैया जे किसानी  के भरोसे अहाँ गाममे नहि टिक सकैत छी।

हे यौ देबु ! 'सगर संसारमे जलवायु परिवर्तन भ'रहल अछि।मिथिलामे सेहो जलवायु बहुत तेज गतिये बदलि रहल अछि।एहि बातकें जतेक जल्दीअकानि लेत मिथिलाक लोक ततेक जीवन सुगम रहतै।ओना अबैवला समय हमरा आर भयावह बुझाइत अछि। '

'देबू! अच्छा ई कहु जे गामक कीर्त मंडली चलयै ने!'

नै भैया! अपन गामक कीर्तन मंडली तँ कहिया ने बन्न भ' गेल।

पुकारे अफसोच! करैत देबु सँ पुछलनि-' से एना कियै भेल देबु?

 'की कहु भैया ! गामक अवस्था आब ओ नहि रहलै।गाममे आब  सामाजिकताक नामपर  भोज छोड़ि क'किछु गतिविधि नहि होइत अछि।

पंचायतीराजक राजनीति आओर जातीय गोलबन्दी चरमपर अछि।स्थिति एहन अछि जे समाजिकताक नामपर दस गोटे कतहुँ एक जगह बैसत से आब मोसकिल अछि। गामक कीर्तन मंडली समाप्त अछि।सामूहिक जे ढोल-झालि छल से भगतजी ओतय पड़ल अछि।भगतजी सेहो आब कतहुँ नहि जाइत छथि।भोर -साँझ अपने दूरापर हरमुनिया ल'क' भजन गबैत रहैत छथि।

'एँ यौ देबु! तखन तँ आब फागुनमे फगुआ गायन सेहो बन्न भ' गेल हैत!


'पुकारे भैया! आब गाममे फगुआ गायन तँ दूर,गाममे आब फगुआ कियो नहि खेलाइत अछि। अहाँ सभक बैच जखन रहै ,केहन गुलजार रहै गाम। तहिया हमसब ओतेक छेटगर नहि भेल रही मुदा सबटा मोन अछिये।वसंत पंचमी दिनसँ मंदिरपर फगुआ शुरूह भ' जाइ।अहाँक बैचक लोकसब गाम छोड़लनि सबटा खतम।'

'ओह की कहु देबू !  बहुत व्यथित छी-पुकारे बजलाह'

दबू! हमर आत्मा तँ आइयो गाममे बसैत अछि।हम कहियो गाम नहि छोड़य  चाहैत रही।मुदा उपाये की रहय? 'पापी  पेट का सबाल है।'

दूबू पुकारे झा सँ कहैत छथि--

'भैया अहुँ तँ आब बड़ कम गाम अबैत छी।

हँ देबु; सत पुछै छी तँ आब गाम जेबाक मोने नहि करयै।जँ गामोमे दिल्लीए जकाँ भरिदिन कोठरीमे बन्न भ' क' रहय पड़य तँ गाम कियैक जाउ?गाम जाइत छी तँ गामक हालत कें देखैत माय सप्पत द' दयै जे तों गामक कोनो बातचीतमे नहि परिह'।गामक संस्था बड़ खराप छै।तोँ गाममे नहि रहैत छह,चारि दिन लेल एलह अछि तँ गामक झमेलमे कियै पड़बह?

से देबू भाइ!एहन हालतमे गाम जेबाक मोन नहि करयै।

एहिबेर जे छठिमे गाम जायब तँ दिलखुश आओर ओकर मायकें सेहो आनि लेबै।हमर पत्नी अपन बेटाक प्रति बड़ साकांक्ष छथि।

कहै छथि-'हमर सबहक जीवन जे भेल से भेल मुदा अपन बेटाक जीवन हम बर्बाद नहि होब' देब।हमहुँ दिल्ली जायब।ओतहि जेना तेना गुजर करब।अहाँ काज करिते छी।हमहुँ किछु काज करब‌।बेटाकें पढ़ायब।काबिल बनायब।'

'देबू!चिंता एके बातक अछि जे  माय-बाबू आब बूढ़ भ' गेल छथि ओ दुनूगोटा कोना रहतथि।मुदा कयै कि सकैत छी।दस बर्षसँ पत्नीक बात टारि रहल छी।आब विद्रोहक स्थिति अछि।बात मानयै पड़त।मायो कहैत रहयै-'कनियाँ जे कहै छथुन  सैह करह।समय बड़ खराप छै।हमर सबहक चिंता जुनि करह।जाबे हाथ-पयर चलैत अछि कोनो चिंता नहि।जखन समांग जबाब देत अहाँ सबकें भार उठबयै पड़त ।कहैत छथि दिल्ली आब पयर  त'र छै।एक जाइ छै,एक अबै छै।मोन उबिआयत तँ रेल धरब आ हमहुँ सब पहुँच जायब दिल्ली।

देबू पुकारेक बात सुनि कहैत छथि-'पुकारे भैया! हम तँ अपन जीवनक तीस बर्ष गामेमे बितौलहुँ अछि।काकी सही कहेत छथि।जँ अपन काज राज करैत गाममे शांतिससँ जीवन बितबय चाहैत छी ,से आब गाममे शाइत  संभव नहि अछि।गाममे अनेक गोल छै।सबहक अपन नेता छै।सबहक अपन गोलैसी छै।गाममे रहबाक अछि तँ कोनो ने कोनो गोलमे शामिल रहू।गोलैसीमे सक्रिय रहू।मासमे दू चारि दिन काजक हर्जाना क'क' ब्लौक-थाना,कोट-कचहरी जेबाक लेल अपन ढौआ-कौड़ीक संग  तैयार रहू।तखन तँ ठीक अन्यथा अहाँ कोपभाजन बनबे करब।'


देबूक बात सुनि क'पुकारे बजलाह,' देबू एहन स्थितिमे गाम कियैक जाउ?

एटका बात कहै छी देबू! दक्षिणी दिल्लीक संगम विहार इलाकामे जे एकटा नबका जे जे कालोनी बनि रहल छै ओतय पचास गज जमीनक हमरो जोगार लागि गेल अछि।किछु टाका अग्रिम देने छियै।इच्छा अछि हमहुँ आब दिल्लीए बैसि जाइ।

Sunday, August 31, 2025

जे.जे. कालोनी: भाग १



इलाका मादीपुर  जे पंजाबी बागसँ सटले छै।रोहतक रोड जे बेस नमगर चौड़गर रोड अछि जे पश्चिमी दिल्लीक  नागलोइ दिस गेलयै‌ आगाँ ओ सड़क  हरियाणाक रोहतक धरि जाइये ।मादीपुर नमहर मोहल्ला अछि,बीस बरख पहिने तँ बहुत असार पसार नहि रहै।जेना अपन सभक बेनीपट्टी बजार अछि एकदम सँ रोडक काते कात तेहनेसन पसरल बजार।जाट गुज्जरक संख्या बेसी,हेबाको चाही दिल्लीक मूलवासी तँ ओएह लोकनि  छथि।

ओहि मादीपुरमे एकटा नमहर झुग्गी रहै।ओहि झुग्गियोमे बेसी स्थानीय अर्थात् दिल्ली -हरियाणाक बेसी लोक रहैत रहथि‌।जाहिमे बेसी अनुसूचित जातिक गरीब लोकसभ झुग्गी बना क' रहैत छल।किछु बिहारी लोकसभ सेहो ओहिमे झुग्गी बना लेने रहय जे मादीपुर एक समयमे दिल्लीक बाहरी इलाका मानल जाइत रहै से रसे-रसे दिल्लीक बीचोबीच आबि गेल।आब मादीपुरक जमीनक महत्व बढ़ि गेलै।बिल्डर सभ बड़का-बड़का बहुमंजिला भवन बनाब' लगलै।शौपिंग मौल सभ खुज' लगलै मुदा तीन सितारा  कालोनीक बीचमे ई झुग्गी सब बहुत असभ्य जकाँ  लगै से संभ्रांत लोकसभ एमहर फ्लैट लेबाक लेल नहि तैयार होइ।फेर बिल्डर सब सरकार पर दबाब बनेलक। मुख्यमंत्रीक बेटाकें पकड़लक जे एहि झुग्गी सभकें हटबा दियौ।  एक दिन सरकार घोषणा केलकै जे मादीपुरक झुग्गी सभकें हटा देल जेतै।ई सरकारी जमीन अछि झुग्गीवला  सभ जमीन खाली करय।मुदा गरीब लोक सभ जाइत कतय? कियो खाली नहि केलक।फेर सरकार सभकें लिखित आश्वासन देलकै जे सब एखन एहि झुग्गीमे रहि रहल अछि सरकार सभकें दू कोठरीक घर बनाक' देतै।सबटा झुग्गी टुटि गेलै।सरकार अपन आश्वासनक अनुकूल सभकें एकटा क' घर बना क' द' देलकै।शेष जमीन लिजपर बिल्डरसभ ल' लेलक।ओहिमे बहुमंजिला भवन  बनि गेल।ओहि झुग्गी बस्तीक नाम आब  जे.जे.कालोनी मादीपुर पड़ि गेलै।ओहि जे.जे कालोनीक एकटा कोठरीमे रहैत रहथि कमिथिलासँ पलायन क'क' गेल  सातटा बैचलर नौजवान।ओ मकान एकटा धोबीक रहै।धोबीकें सरकार दिससँ दू कोठरीक घर देल गेल रहै।नीचाँ कोठरीमे अपन परिवार संग रहैत रहय।उपरका भाड़ा पर लगा लेलक।नीचाँमे अपन घरक आगाँमे एकटा चौकी लगाक' एकटा आयरन प्रेस करबाक दोकान सेहो चलब' लागल।एहि जे.जे.कालोनीक प्राय:सभ मकानक बनाबट आओर बसाबट एहने रहै।सभ नीचाँक कोठरीमे अपने रहय आओर उपरका भाड़ापर द' देने रहै।प्राय:मकानमे बिहारी दिहारीवला मजदूर सभ रहैत रहय। मिथिलामे चिन्नीक मिल सभ बन्न भ' गेल रहै।  

पण्डौलक सूता मिल,समस्तीपुरक अशोक पेपर मिल सेहो बन्न। बात अस्सी आओर नब्बेक दशकक अछि।बिहारक कालेजसँ पढ़ाइक वातावरण समाप्त भ' गेल रहै।तीन बर्षक स्नातक करैमे सात-आठ बर्ष धरि लागि जाइत रहै।बिहारक नवयुवक सभ  किंकर्तव्यविमूढ़ भ' गेल रहय।एक तँ खेतक जोतक छोट आकार दोसर दाही -रौदीक मारि।नोकरीक खोजमे नौजवान सभ जतय-ततय बौआइत टौआइत रहय।किछु नौवजान जे गामपर रहय से त्रिकाल विजया द'क' भरि दिन तास फेटयमे मस्त रहय लागल।भांग आ पान तँ हेबे करय जँ कतहुँ जोगार लागि जाय तँ किछु मधुरो भ' जाइ‌।एहन सन वातावरणमे मिथिलाक नौजवान सभक लेल एकटा नब ठेकाना उभरि क' जे शहर आयल ओ छल दिल्ली।दिल्लीकें मिथिलामे दिलवाला शहर कहल जाइत छैक।जाहि दिल्लीकें कुतुबुद्दिन एबक 'दिल्ली दूर अस्त'कहने रहै।से दिल्ली आब मिथिलिवला लोकसभक लेल पैर त'र भ' गेलै।सबहक कोनो ने कोनो सम्बन्धी ओहि दिल्ली महानगरमे रहिते रहै।ताहि दिल्ली लेल विदहा भेल रहथि कालिकापुर गामक मनोहर आओर देबू ।दुनू बचपनक मीत रहथि।समस्तीपुर सँ वैशाली एक्सप्रेस पकड़ि  दुनू दिल्ली पहुँचल रहथि।नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरि दुनू गोटे पुछारि करैत नागलोइ जायबला  डी .टी. सी क बस पकड़ि पहुँच गेल रहथि  जे.जे.कालोनी मादीपुर।ओहि जे.जे.कालोनी मे रहैत रहथिन हिनकर गौंवासभ।सभ दिहारीपर मजूरी करैवला।माने कोनो स्थायी नोकरी नहि रोज कमाउ रोज खाऊ।ओ लोकनि साधारणे पढ़ल -लिखल मुदा मनोहर आओर देबू तँ बी. ए पास रहथि। से जखन गौंवा सभक डेरापर पहुँचल रहथि तँ ओ लोकनि हिनका सभक स्वागत केलखिन आओर पन्द्रह दिन धरि संगमे रहबाक संगहिअपन संयुक्त मेसमे भोजन करबाक अनुमति सेहो द' देलखिन।एकटा अनजान महानगरमे ई बड़ पैघ बात भेलैक।

मनोहरक पड़ोसिया रहथि पुकारे झा से कहलखिन ," देखू मनोहर अहाँ सभ पढ़ल लिखल छी।एहि कोठरीमे रहैमे बहुत दिक्कत हैत।हमसब छ:गोटा पहिनहि सँ छी।जँ एहि दिक्कत-सिक्कत मे गुंजाइस करब तँ हमरा सभकें कोनो आपत्ति नहि।शौचालय  समगर्दा छै भोरे सँ लाइनमे लाग' पड़त।पन्द्रह दिन धरिक किरेया अहाँलोकनिसँ नहि लेल जायत जँ ओहि सँ बेसी दिन रहब तँ भाड़ा लागत।।"

मनोहर पुकारे झा कें जबाव दैत कहलखिन," भैया !अहाँ तँ जनिते छी पहिलबेर दिल्ली आयल छी।दोसर ककरा लग जायब।अपन आर जे किछु ग्रामीण सभ रहैत छथि वा कुटुमवर्गादि से सभ भी आइ पी इलाकामे परिवारक संग रहैत छथि।ओतय हमरा सभक  गुंजाइस नहि हैत तें अहीं लग हम दुनू गोटा एलहुँ।आब तँ आबि गेल छी।कोनो छोटोमोटो नोकरी भेटि जाय बस। हमसब एखन एतहि  रहब।आगाँ देखल जेतै।

पुकारे झा कहलनि,'मनोहर!तखन अटैची राखू आओर हाथ-पैर धो लिअ।जे किछु बनल अछि से खा लिअ।हमसब गोटा काजपर निकलैवला छी।हमसब सांझूपहर घुरब।अहाँसभ रेलक झमारल छी।आइ आराम करू। 

मनोहर- बेस भैया !

'जाउ अहाँ सब।'

'सांझूपहर भेटब  तँ बातचीत करब।'

Thursday, July 3, 2025

गुण-कथाक गुनगर विवेचन -- दिलीप कुमार झा

डा. शिवशंकर श्रीनिवास मैथिलीक अति प्रतिष्ठित कथाकार छथि।अपना कथाक कारणें मिथिला आ मिथिला क्षेत्र सँ बाहरो अर्चित- चर्चित छथि। हिनक कथा ने फटाफट समाचार अछि ने एलोपैथिक दवाई। हिनक कथामे समाजक छोट -छोट घटनाक बहुत तार्किक आ मार्मिक ढंग सँ विश्लेषण कयल जाइत अछि।प्राय: कथा अपन नव आयाम प्रस्तुत करैत अछि। हिनक कथा एलोपैथिक दवाई जकाँ तत्क्षण रोगक शमन वा दर्द निवारण करबाक उपाय नहि करैत अछि,ने कोनो साइड इफेक्टक खतरा। हिनक कथा केँ हम शुद्ध आयुर्वेदिक औषधि मानैत छी जे सिर्फ इलाज नहि रोगक निदान करैत अछि। कतहुं - कतहुं हम पढ़ैत रहैत छी जे श्रीनिवासजी गामक कथाकार छथि हम एहि बात सँ सहमति नहि रखैत छी।ओ गाममे रहैत छथि तेँ ओ गामक कथाकार भ' गेलाह! ओ मिथिलाक कथाकार छथि, ओ भारतक कथाकार छथि,ओ अखिल विश्वक कथाकार छथि से ओ अपन नीजी वैशिषट्यक संग छथि। वैश्विक जनतब आ ओकर विश्लेषणक संग सभठाम कथामे उपस्थित छथि।ताहिलेल हिनक कथा केँ पढ़' पड़त,गुण' पड़त। सम्प्रति हम गप करय चाहैत छी हिनक चारिम कथा संग्रह " गुण कथा क प्रसंग।

एहि संग्रहक पहिल कथा अछि साहुकारी। बजारवाद कोना सगरे संसारमे पयर पसारि लेलक अछि तकर कथा अछि।टाकाक सोझां व्यक्तिक रुचि, अपना कार्यसँ संतोष ,जीवन मूल्य जेना किछु रहिये ने गेल हो ।प्रस्तुत कथामे गोपीनाथ एकटा शिक्षक छथि आ कहानीकार सेहो।ओ अभावमे रहितो अपना काज सँ संन्तुष्ट छथि मुदा हुनक चारुकातक वातावरण हुनक महत्वक आकलन टाकाक आधारपर करैत अछि।चाहे हुनक सहपाठी अमरनाथ होथि वा हुनक पुत्र छोटे वा पत्नीए किये ने होथि।सभ कियो हिनक कथा के बाजार मूल्यपर तौलबाक ताक' मे लागल रहैत छथि। हिनक कथाक बजारक अतिरिक्त किछु सामाजिक मूल्य नहिअछि। हिनक कथा सभमे मानवीय मूल्यक अवलोकनक फुरसति ककरा छैक?महानगरमे गामक गप शप केँ मीर्च - मशाला बुझल जाइछ। बजारवादक प्रभाव नेना सभपर सेहो बहुत नीक जेकाँ पड़ि रहल छैक।सभ प्रोफेशनल बनय चाहैत अछि ,उद्देश्य टाका कमेनाय।जं कियो देश सेवा करय चाहैत अछि ,ओ प्रहसनक बिषय भ' जाइत अछि।कतेक खराप परस्थिति उत्पन्न भ' गेल अछि से ई कथा स्पष्ट रुपें बाजि रहल अछि। मुदा एकटा बात एतेक भेलाक बादो गोपीनाथसन मास्टरो लागल छथिये,भले कियो मानय वा नहि मानय।

संग्रहक दोसर कथा अछि सहरजमीन, एहि कथाक कथानायक छथि बलदेव जे समाजमे उँच्च जातिक जमिंदार सँ लड़ैत छथि मुदा ओकर दबंगता सँ पीड़ित भ' गाम छोड़ि चलि छाइत छथि।परदेशमे जतय रहैत छथि ओतय अपन गौंआ -घरुआ जे भेटैत छनि सभके यथासंभव मदति करैत छथि। गामक एकटा समांग सोहन जे हुनके लग काज करैत अछि ओ हिनका गाम एबाक लेल बहुत उत्प्रेरित करैत अछि ओ कहैत अछि बड़का जातिक उपर सँ नीचाँ धरि राजपाट खतम भ' गेलै ।गाम बदलि गेलै चलि क' देखहक ।बलदेव चालीस बर्खपर गाम अबैत छथि मुदा गाममे जे पुरनका बात रहै,अपनैती रहय से आब कतहु नहि भेटलनि।अपनत्वक नामपर ओएह गोसाइं पोखरि आ पाकरिक गाछ भेटै छनि। अपने समांग आनंद चौधरी मंत्री बनि जाइत छथि मुदा हुनकर रहन- सहन ,हाव - भाव सँ सभटा ओहने जेहन पुरना जमिंदार सभक रहैत छलै। समाजमे सत्ताक हस्तान्तरण अवश्य भेलैक ।पहिने पंचायत सं संसद धरि सभठां उँच जातिक कब्जा छलैक जे आब पिछड़ा ,दलित लग आबि गेलै मुदा लोक ओहिना अछि।सत्तामे नवब्राह्मणवादक आगमनक अतिरिक्त आर किछु नहि भेलै से ई कथा निर्णायक प्रश्न ठाढ़ करैये।

एहि संग्रहक तेसर कथा थिक सतभैंया । जाति - पातिक समाजमे दुरावस्थाक कथा थिक सतभैंया। समाजमे एखनो जाति पाति छैके मुदा कालक्रमेण समाज बहुत आगु बढ़ल अछि। विनोदक पढ़ल लिखल बेटी अपर्णा अपना मोन सँ अपन विवाह एकटा नीक कलाकार,नीक मनुक्ख जे ओकरा पसिन करैत छैक तकरा सँ करबाक निर्णय लैत अछि।मुदा छैक ओ मुसलमान। विनोद अन्तर्द्वन्द्व मे पड़ल रहैत छथि मुदा समूचा परिवार कोनो सामाजिक रीति रेवाज के बिनु परबाहि कयने बेटीक खुशीक चिंता करैत अछि । ताहि मे सभसँ बढ़ि चढ़ि क' भाग लतै छथि विनोदक माय।ओ कहैत छथि एहि जाति धर्मक हमहूँ मारल छी। हमर सक्क चलय त' ई जाति-पाति- धर्म के चुल्हि मे डिहि दितियै।मात्र मनुक्ख रहितै आर रहितै ओकर गुण। जाति पाति राजनीतिक आ समाजिक मंचपर एखनो अकादारुण जकाँ ठाढ़ अछि।ई कथा समाजक समक्ष एकटा गंभीर बहस त' अबस्से आरंभ करैत अछि।

एकटा महत्वपूर्णकथा अछि एहि पोथीक शीर्षक कथा ' गुणकथा' ।गुणकथा मनुक्खताक गुणक कथा अछि।भीड़ मे रहैत आइ मनुक्ख असगर अछि।अपन झूठक अभिमान आ देखाबाक कारण लोक मनुक्खता बिसरि गेल।एहि कथाक अंजनी देवी जे गाम सँ जयपुर गेलीह त' बेटाक आलीशान बंगला ,सुख सुविधा अछैतो ओ गरीब ,मजदूर लोकक बस्तीमे जाक' बच्चा सभके आखर सिखब' लगली ,ओकरा सभके मिथिला चित्रकलाक प्रशिक्षण सेहो देब'लगली।ओहि सामान्यजनक बीच काज क'क' अंजनी देवी कें अपार सुखक प्राप्ति होइन मुदा अपना के आधुनिक कहयबला बेटा पुतहु के अंजनी देबीक काज सँ मानहानि बुझाय लगलनि।अंजनी देवी गामो मे एहने सामाजिक काजमे लागल रहैत छलि।तेँ अंजनी देवी अपना जीवन सँ प्रसन्न छलि।हिनक सेवाभावनाक कारण गरीब लोकक ई बड़ी माँ भ' गेल छलि मुदा चिंताक बात ई जे हिनक पोता जे अमेरिकामे नामी कंपनीमे काज करैत अछि अपन दादीक कलाप्रेम , शिक्षा आ समाजसेवा सँ ओतेक प्रभावित नहि अछि।ओ हुनक यशक मार्केटिंग करबाक सोचैत अछि।।कथामे मानवीय मूल्यक क्षरण आ निकट सँ निकट सम्बन्धक पहिचान बाजारमूल्पर आँकल जयबाक बात एहि कथामे आयल अछि।संगहि कथामे मातृभाषा प्रेम सेहो यत्र - तत्र झलकैत अछि।

"रूमाल" दाम्पत्य जीवनक विलक्षण कथा अछि। बड़ा साहेब,विमलचन्द्र ठाकुर,आ बूढ़ा-बूढ़ीक जोड़ीक तीनटा दम्पतिक कथा अछि।एकटा विलक्षण बिम्ब अछि एहि कथामे 'मात्र कोनो बाँसक खुट्टाक सोंङर पर कोनो टाट ठाढ़ देखलिए? ओहिमे देखू जँ टाट के हटा लेबै त' खुट्टा खसि पड़त आ जँ खुट्टा के हटा लेबै त' टाट खसि पड़त मुदा दुनू दुनू के ठाढ़ केने रहैए'।ई थिक दाम्पत्य जीवनक बेगरता।आपसी प्रेम आ सहयोग सँ चलैत अछि पारिवारिक सम्बन्ध।

एकटा कथा अछि दबाइ।एकटा बंगालिन जे प्रेम विवाह क' के सुखदेवा संगे कलकत्ता सँ आबि गेल।सुखदेब ओकरा आ ओकरा मामीक संग छल केलकै ओ कहलकै जे ओ बाभन अछि मुदा एतय एलाक बाद पता चललै जे ओ दुसाध अछि। बंगालिन के अपना ल' क' कोनो दुख नहि छैक मुदा ओकर मामा -मामी के ई बड़ ठकान ठकलकै से ओकरा बड़ तकलिफ छै।।ई विश्वास तोड़ल जयबाक कथा अछि।एहि कथाक एकटा विलक्षण संवाद जे डा. शिवशंकर श्रीनिवासक नीजी विशेषता छनि अन्यत्र भेटब दुर्लभ ।देखल जाय,"भाउज- दिअरक पहिले भेंट मे झगड़ा! हमर गपपर फुटि क' हँसलि, से लागल जेना फुलही थारी पर दू- चारिटा अठन्नी गुड़कि गेल हो। सुखदेबाक माय सेहो हँसलि रहय।

'उग्रह' कथा आजुक समयक यथार्थ अछि ।आइ लोक अपन स्वार्थ सिद्धिक लेल नैतिक ,अनैतिक कोनो पड़बाह नै करैये । कहनो हथकंडा अपनाबै सँ परहेज,बनहेज नहि ,से जँ कियो निश्छल आ निर्मल अछि त' सहजे कियो ओकरा नहि मानैत छैक।नहि मानैत छैक ताहि लेल कोनो बात ने मुदा ओहि व्यक्तिक नीजी जीवनक सेहो बिनु कोनो परबाहि कयने जँ कोनो प्रकार लाभ कोनो व्यक्ति सँ होइबला अछि त' लाभ लेबाक लेल ओहि व्यक्ति केँ कोन रुप सँ बेवहार कयल जाइछ से एहि कथामे आयल अछि। कथानायक जे स्वयं कथाकार छथि जिनक मित्र अपनहि जिलाक कलक्टर छथिन ओहो कथाकार छथि।दुनू साहित्यकारक मध्य आपकताक बात पसरि गेल । जकरा ककरो लगलै जे हिनका माध्यम सँ कलक्टर सँ हमर काज सिद्ध भ' सकैत अछि से हिनका पाछु लागि गेल।कथानायक त' एकदिन बहुत चिंतित भ' गेल छलाह मुदा रक्ष रहलै विहाने कलक्टर साहेबक बदली दोसरठाम भ' गेलनि। ई गौरवबोध ककरो नहि भेलै जे हमर समाजक एक व्यक्ति एतेक पैघ कथाकार छथि! आ ईहो महत्व नहि बुझलक जे कलक्टर होइतो कलक्टर साहेब अपन साहित्यकारक धर्म के निमाहि रहलाह अछि।आजुक ई सामाजिक सत्य अछि।अहाँ देशक पैघ वैज्ञानिक छी,अहाँ बहुत नीक शिक्षक छी,अहाँ बहुत पैघ साहित्यकार छी।लोकक लेखें धनसन।हँ,अहाँ ककरो बेटा के चाकरी लगा सकैत छी। अहां अपनह रौबदाव सँ ककरो अनर्गल लाभ पहुंचा सकैत छी।नहि त' दसटा लफंगा सभकें संझुका खर्चा द' सकै छी ।त' लिअ ने जे छी से अहीं।

'रसक अर्थ' ई दूटा माम भागिनक कथा अछि।मामा कालीचरण आ भागिन गिरधर। गिरधर माय के फोन करै छथि जे माय हम गाम आबि रहल छी।माय के बहुत खुशी होइत छनि मुदा फेर दोसरे क्षण ओ कहैत छथि माय हम सभदिनक लेल गामे रहबाक लेल आबि रहल छी । बादक गप माय केँ बड़ अनसोंहाँत लगैत छनि।गिरधर गाम रहि क' की करता? हुनका मोन पड़ि जाइत छथिन कालीचरण अपन भाय जे सुन्दर नौकरी छोड़ि क' गाम रहबाक लेल एला खेतीबारी करय लगलाह,किछु दिन बनिज सेहो कयलनि मुदा सफलता नै भेटलनि ।बहुतरास ऋण पैंच क'क' फेर शहर घुरि गेलाह।मुदा गिरधरक पिता एहि सँ प्रसन्न छलाह जे जँ गिरधर सन योग्य व्यक्ति गाममे रहय लगताह त' गामट काया पलट भ' जायत। कहु जँ सभक माय एहिना सोचतै जे हमर बेटा गाम किये रहत? तखन गामक की हेतै?गाम आ शहरक संतुलन बनक चाही। लेखकक ईशारा साफ छनि। गिरधर त' आबि रहलाह अछि से ठीके मुदा भारत सरकार जे हुनका गामे लग वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्र खोललक अछि ओकर मुख्य वैज्ञानिक बनि क' आबि रहलाह अछि‌।वैज्ञानिक संगे चाही किसान,मजदूर,शिक्षक,डाक्टर आर बहुतो पेशाजन्य लोक से गाम के बसेला सँ हेतै उजारला सँ नहि।

मिथिलामे वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्रक स्थापना कथाक एकटा दूरदृष्टि पथ सेहो देखबैत अछि।

जीवनमे राग आ अनुरागक बड़ महत्व होइत छैक। एहि संग्रहमे एकटा कथा छैक अनुराग।अनुराग ओकरे प्रति उमरैत छैक जकरा लेल कोनो व्यक्तिक मोनमे अथाह प्रेम रहैत छैक। ओहि व्यक्ति सं कतेक प्रेम करैत अछि से ओ अपनहुं नहि बुझैत अछि।अनुराग कथामे नरेन्द्रक पीसी कें नरेन्द्र सँ बड़ प्रेम छनि।नेनपने सँ नरेन्द्र के बड़ मानथि पीसी ।जखने नरेन्द्र पीसी सँ भेट करय जाथि पीसीक अनुराग छिलक' लागय।पीसी भातिजक प्रेम के देखि क' कियो ई अनुमान लगा सकैत छल।पीसी बड सुन्दर लिखिया करथि।सभटा चित्र लिखि- लिखि क' रखने जाथि।एक दिन नरेन्द्र जे देखलनि त' आश्चर्यचकित भ' गेलाह! केहन -केहन अवधारणा हिनका मोनमे उपजल छनि।अद्भुत! पीसी ई सभटा चित्र ओरिया क' राखू एकरा हम किताब छपा देब ।जाहि सँ पुरा दुनियांक लोक अहाँक कला के देखि सकत संगहि एकटा मिथिलाक सामान्य नारीक सोच सं सेहो अवगत भ' सकत। युवापनक ई गप नरेन्द्र गिरहस्थ जीवनमे आबि बिसरि गेलाह।मुदा पीसी त' एकटा कलाकार,सृजनधर्मी छलीह।सृजनकर्ताकें जकरापर मोन मानतै छैक तकरे ओ अपन सर्वस्व न्योछाबर क' सकैये।से पीसी के अपन भरल पुरल परिवार अछैत अपन जीवनक सभसं अमूल्य वस्तु नरेन्द्र के देलखिन एहि विश्वासक संग जे ओ हमर सृजन के महत्व देत।बिरहोबांट नहि होब' देत।एकटा लेखक,कवि वा कलाकारक मोल एहने कोनो पारखी जानि सकैये।

'आयास' कथा मे गाममे नेना सभक कमी के रेखांकित कयल गेल अछि,विशेष क' लड़की सभक।भारतमे स्त्री - पुरुष लिंगानुपात बहुत चिंताजनक स्थितिमे छैक से मिथिलामे सेहो।कुमारी भोजन लेल गाममे कुमारि कन्या भेटब दुरूह भ' गेल अछि। ई कथा गाम सं लोकक पलायनक दुरावस्थाक चित्रण करैत अछि।हिनक कथामे गामक बहुतरास दृश्य जे चिंतित करैत छैक मुदा लेखक एक दूटा एहन पात्रक सृजन अवश्य करैत छथि जे गाम के ओ नहि बुड़' देत चाहे ओ भोलानाथ ठाकुर होथि,लाल यादव होथि वा अनुराधा । गाम के हर हालति मे बचेनाय सेहो कथाकारक एकटा आन्दोलन छनि से हमरा फरिछा क' बुझय पड़त।

'पितामही' कथा आजुक नगरीय जीवनमे जे पारिवारिक टुटन अछि,घुटन अछि तकर कथा अछि।पोता - पोती के बाबा -बाबी बड़ प्रिय से सभदिना। असली दुलार त' लोक अपन पितामही- पितामहे सँ पबैत अछि। से पोती स्वातीक व्यथा सुनि विश्वेश्वरजी आ हुनक पत्नी के बड़ भावुक क' दैत छनि।से कथा पढ़निहार के सेहो।ओह! की भावुकताक कथा अछि ई। एहन घटना अपना समाजमे घनोरो होइत रहैत अछि।एहि कथा के कहबाक जे शैली , शब्दक जे गढ़नि आ वाक्य विन्यासक कमाल हमरा मोन के छहोछित्त क' देलक।एहि कथा के पढलाक बाद बस आर किछु नहि !लेखकक कलमक नीचां हम नतसिर भ' जाइत अछि।

धार नहि मजरलै एहि संग्रहक एकटा महत्वपूर्ण कथा अछि।ई रुपनी नामक एकटा विधवाक कथा थिक। एकटा एहन स्त्रीक कथा जे कमे उमेरमे विधवा भ' जाइत अछि।ओकरा एकटा संतान सेहो होइछ ,तैयो दोसर विवाहमे कोनो रुकावट नहि छलै।माय -बाप विवाह करेबाक लेल तैयार छलै मुदा अपना सासु ससुर के हालति देखि नै केलक।लागि गेल सासु ससुर आ बेटाक लालन - पालन मे।एकटा समय एहनो एलै जे अधवयसमे जखन बेटा ओकर कोनो छौंड़ीक संग भागि गेलै।ओ असकरुआ भ' गेल।असकरुआपनक अवसाद घेरि लेलकै।ओहि समयमे ओकरा भेटै छथि विराटबाबू सन पुरुख जे जिनक आकर्षण सं रुपनीक मोनमे वैधव्यक पछाति पहिलबेर हलचल मच' लगलै । पाठक कें लगैत छैक जे फेर सँ रुपनीक नव जीवन आरंभ हेतै से नहि भेलै आ भेबो केलै। रुपनी एकटा गाय आ बाछीक वात्सल्यमे फेर रमि गेल।धार नहि मजरलै। ई कथा एकटा अन्तर्द्वन्द्व उत्पन्न करैछ। रुपनी एकटा नव जीवन आरंभ करैत विराट बाबूक संग से सभटा तैयारी भेलाक बाद नहि भ' सकलै। मुदा भ' सकैयै ओकर आगांक जीवन आओर खराप भ' जइतै।तखन जे निर्णय लेलनि से नीके लेलनि।

मनुक्ख नदी थिक भारतीय समाजक बदलैत परिवेशक कथा थिक। समाज जे सय बर्ख पहिने छल से आब नहि अछि।भेष भूसा,खान पीन सँ ल' क' सभ किछु बदलि गेलैक अछि। एक संस्कृति सँ दोसर संस्कृति मे मिश्रण पुरान पीढ़ी कें असहज करैत छैक।मुदा वरिष्ठ लोकनि कें श्यामजी जकाँ पहाड़ नहि नदी बनय पड़तनि, कारण मनुक्ख नदी थिक।सभ नदीक अपन बाट होइछ। सभके अपना बाटे बहबाक आजादी देबहि पड़तै।

तखने नवपीढ़ी आ पुरान पीढ़ीक अंतर पाटल जा सकत। कथा नीक अछि।

एहि संग्रहक तेरहो कथा पढलाक बाद पाठकीय दृष्टिकोण सँ हम ई मजगुती सँ कहि पाबि रहल छी जे ' गुणकथा ' समकालीन मैथिली कथाक प्रतिनिधि पोथी अछि।हमरा लग एहन उँच्च कोटि कथाकार छथि ,तकर हमरा गौरव अछि।आइ मैथिली कथा भारतीय कथा साहित्यक समक्ष एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि ताहिमे डा.शिवशंकर श्रीनिवास बहुत महत्वपूर्ण छथि। हिनक कथा गढ़बाक अपन नीजी शिल्प आ शैली छनि। गुण- कथा मैथिली कथाक महत्वपूर्ण संग्रह अछि।

Thursday, February 27, 2025

Seeta in the realm of Maithili literature : Dilip Kumar Jha

मैथिली साहित्यमे सीता



सीताक जन्मक बिषयमे रामायणमे वाल्मीकीजी लिखैत छथि,
"अथ मे कृषत:क्षेत्रे लाङ्गलादुत्थिता तत:।।
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेती विश्रुता।
भूतला दुत्थिता सा तु व्यवर्धयत् ममात्मजा।।
एक दिन यज्ञक लेल भूमिशोधन करैतकाल खेतमे राजा जनक ह'र  जोतैत छलाह ओहि समय ह'रक अगिला भाग जकरा फार वा फाल  सँ किछु ठेकैत अछि ओहि कालमे भूमिसँ एकटा सुन्दर कन्या प्रगट भेलीह (घिचल रेख जकरा सीता कहल जाइत छलैक) सीता सँ उत्पन्न हेबाक कारणें कन्याक नाम सीता राखल  गेल। धरतीसँ प्रकट भेल कन्या बढ़ि क' आब सियान भ' गेलीह‌।
संसार भरिमे अनेकानेक भाषामे रामायणमे सीताक विराट चरित्रक चित्रण भेल अछि।मैथिली भाषा साहित्यमे सेहो सीताक बहुत विस्तृत वर्णन कयल गेल अछि।जाहिमे सभसँ पहिने हम चन्दा झा विरचित 'मिथिला भाषा रामायण'क चर्चा करब उचित बुझैत छी।महाकवि चन्दा झा जानकीक जन्मक बिषयमे लिखैत छथि---
'कन्या रमा-समा मिथिलेश। तप-बल पाओल तिरहुति देश।।
धरणी तनया अति सुकुमारी।छविमय रति विजय अवतारि।।
त्रिभुवन देखल सुनल नहि कान।वनिताजन विरचल विधि आन।।
आगत नृपवर जनक समाज।जनकक कहल सुनल हो काज
शिवक धनुष भञ्जन कर जैह।वैदेही व'र होयताह सैह।।
मिथिला भाषा रामायण सेहो आने रामायण जकाँ  सम्पूर्ण रूपसँ रामकथा पर आधारित अछि तेँ एतहुँ सीता सभठाम उपस्थित छथि।प्राय:रामकथा मे सीता  धनुष  यज्ञ के समय प्रकट होइत छथि मिथिला भाषा रामायण मे सेहो तहिना छथि।सुन्दरकांड मे सीताक वर्णन बहुत फरीछ सँ आयल अछि। जानकीकें अपना जन्मभूमि सँ बहुत लगाव छनि।अपन  परिचयमे अपन माता-पिता,पति, देओर के नाम तँ लैते छथि संगहि अपन नैहरक नाम लेब नहि बिसरैत छथि।
जनक जनक जननी अवनि,रघुनन्दन प्राणेश।
देवर लक्ष्मण हमर छथि,नैहर मिथिला देश।।
हुनका गर्व छलनि जे हमर जन्मभूमि मिथिला अछि एहन गर्व हमरो सभकें हेबाक चाही।से कियैक नहि अछि ?ताहिपर हम सोचैत रहैत छी।कवीश्वर चन्दा झा अपन रामायणक सुन्दरकाण्डमे सीताक उपस्थापन बहुत महत्वपूर्ण ढंग सँ कयलनि अछि।।एना कहल जाय जे एहि कांडक मुख्यपात्र सीते छथि।हेबाको चाही से बिभिन्न रामायणमे सैह अछि‌।सुन्दरकाण्डक रचनाक मूलमे अछि सीताक खोज करब।जखन हनुमानजी सीताकें तकै लेल लंका विदा होइत छथि तँ सीताक दर्शन लेल हनुमानजी व्याकुल भ' उठैत छथि--
'वैदेही हम देखब आज।दोसर गहन आन की काज
(सुन्दरकाण्ड पृष्ठ-187)
सीता अशोक वाटिका मे बहुत डेरायल सहमलि बैसल  रहैत छथि।
तकर वर्णन कवीश्वर एकटा गीतक माध्यम सँ कयलनि अछि।केहन मार्मिक वर्णन छै से देखल जाय
'हा रघुनाथ अनाथ जकाँ दशकंठ पुरी हम आयल छी।
सिंहक त्रास महावनमे हरिणीक समान डेरायल छी।।
चन्द्र चकोरि अहैंक सदा हम शोक-समुद्र  समाइलि छी।
देवर दोष कहू हम की अपन अपराध सँ काइलि छी।
(सुन्दरकांड,पृष्ठ-198)
रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे महाकवि लालदास सीताकें लक्ष्मीक अवतार रूमे प्रतिष्ठित कयलनि अछि।एकटा अद्भुत् बात एहि रामायणक ई जे एहि रामायणमे सीताक महत्ताकें हुनक चरित्रक विराट फलककें पं.लालदास बहुत प्रमुखता सँ वर्णन कयलनि अछि।रामायणक नामो तँ मिथिला रामायण अछि तखन सीताक प्रधानता कोना नहि रहतनि।मङ़्लाचरण मे लालदास सीताकें लक्ष्मी आओर कालीक रूपमे  वर्णन करैत छथि।
'प्रणमों लक्ष्मीक दश विधि रूप।पुरथु मोर अभिलाष अनूप।।
सीता प्रथमा काली नाम।कृत सहसासन-पुर संग्राम।।
दोहा--'मूल प्रकृति लक्ष्मी जनिक,सीता रूप प्रधान।
तनिक नाम जपि पाब नर, दुहु लोकक कल्याण।।
महाकवि सीता नाम जपक अमित प्रभावक बखान करैत कहैत छथि--
'सीता नामक अमित प्रभाव।चतुरवर्ग फल जातक पाव।।
सीता जन्मक बिषयमे महाकवि वाल्मीकिजीसँ किछु फराक कथा कहैत छथि।हुनक कहब छनि जे जखन रावन  तीनू लोकपर विजय प्राप्त क' लेलक तखन ओ सुर,नर,मुनि सभकें  अपार कष्ट देबय लागल।एकबेर ओ दण्डकारण्यमे मुनि सभसँ कर मंगलक ,मुनि सभ लग की रहनि जे दितथिन से मुनि सभ अपना शरीरक शोणित पाचि क' द' देलथिन।ओ सभटा शोणितकें घटमे जमा क' लेलक।ओकर एहि कुकृत्य  सँ  मुनि सभ बहुत क्रुद्ध भ' गेलथि आओर कहलनि जे  रावण ई शोणित घट तोहर विनाशक कारण बनतौ। मिथिलाक महान  विद्वत् परंपरा सँ रावण बहुत क्रुद्ध छल से ओ सोचलक कियै ने एहि घट कें मिथिलेमे गड़वाय दी।बुझथु मिथिलाक लोक बड़ ज्ञानी बनैत छथि से आब हिनका सभक विनाश हेतनि। एहि विचार सँ ओ घट दूतक माध्यमसँ मिथिलामे गड़बाय देलनि--
'बड़ पंडित कहबथि मिथिलेश बुझता जखन विनाशत देश।।
ई विचार द्रूत दूत पठाय। मिथिलामे घट देल गड़बाय।।
एहि विधि किछु दिन बीतल जखन।अनावृष्टि मिथिलामे तखन।।
ज्योतिष पंडित सम्मति देल।जनक स्वयं हर कर गहि लेल।।जोतय लगला जेहि खन भूमि।बहरायल घट तेहि खन घूमि।।
घटसौं ज्योति विनर्गत भेल।तेजमयी कन्या लखि लेल
विस्मय मानव जनक नरेश। गगन गिरा तगनहि भेल बेश
ई कन्या लक्ष्मी अवतार सीता नाम करब परचार।।
भेल वृष्टि सूख लक्ष्मीक दृष्टि।बाँचल मिथिला भूमिक सृष्टि।।
सुख ऋद्धि सभ सिद्धि।होमय लागल मिथिलामे वृद्धि।।
सीता लक्ष्मीक अवतार छलथि से महाकवि लालदास लिखैत कहैत छथि।सीता शक्ति स्वरूपा छथि तें ने जाहि धनुषकें केहन-केहन योद्धा  टकसा नहि सकल तकरा सीता वाम कर सँ  उठा क'  ओतय ठांवबाट कय लेलनि।
अनायासहि निपितहि धनु धाय।बामहि करसौं लेल उठाय।।
बाम हाथ धनु अवनत माथ।नोचथि तृण कुश दहिना हाथ।।
अयला नृप कयनहि अस्नान।देखि चकित कृत मन अनुमान।।
शिवधनु उठ नहि ककरो बूत।से सीता धयलनि अजगूत।।
जानकी जन्म प्रसंग कविवर सीताराम झाक रचित महाकाव्य छनि 'अम्बचरित'।अम्ब चरित मे सेहो सीताक जन्मक रोचक कथा अछि जे लालदास कृत रमेश्वर चरित रामायणसँ  थोड़ेक फराक अछि।अम्ब चरितमे कविवर लिखैत छथि सीताक जन्म रावनक पत्नी  मंदोदरीक गर्भ सँ  भेल छलनि।अम्ब चरितमे कहल गेल अछि गृत्समद नामक मुनि अपना पत्नीक आग्रह पर  एकटा कन्याक उत्पत्ति हेतु एकटा नव कलश कें अभिशिक्त क' ओहिमे गाइक दूध ढारलनि आओर पत्नीकें कहलथिन जे आजुक दशम दिन जे  स्त्री एहि दूध कें पीबि लेती तिनका गर्भसँ स्वयं  लक्ष्मी अवतार लेतीह।ओहि कालमे महाविनाशक रावण ओतय पहुंचि गेल।ओ मुनिजन सँ करक रूपमे हुनका लोकनिक रक्त पाचिक' ओहि दूधवला कलशमे राखि घट सहित लंका उड़ि गेल।ओहि घटमे राखल द्रवकें मनदोदरी पीबि लेलनि आओर ओ गर्भवती भ' गेलीह।रावण देशाटन पर गेल छलाह।से ओ लोकापवाद सँ बचबाक लेल मिथिलामे आबि शिशुकें जन्म देलनि आओर अमृत छीटि ओहि शिशु कें मंजुषामे राखि धरती त'रमे गाड़ि देलनि ।राज जनक जखन यज्ञक लेल ह'र जोति रहल छलाह तँ अनायासे सिराउर पर ह'रसँ  मंजुषा  ठेकलनि आओर ओहिमे सँ एकटा दिव्य कन्या बहरयलि।
'पढ़ि स्वस्तिवचन कहि श्रीगणेश
लगला जोतय यागक प्रदेश
लगिचौलनि चास बचाय  ठेस
ता भेल शुभद नवमी -प्रवेश
गम्भीर सिराउर लागि फार
उखरल पेटी शोभा-अगार 
ताहिमे राखल कन्या अनूप
नवजात चकितचित देखि रूप
ई दृश्य जखने उपस्थित भेल सभ आश्चर्यचकित भ' गेल। कविवर सीताराम झा एहि दृश्यक वर्णन एहि तरहें कयल अछि।
'छल निर्निमेष तत जनक दृष्टि
ता भेल गगन सौं सुमन वृष्टि
बिनु देहक वानी भेल व्यक्त
हेभूप! अहाँ छी परम भक्त
रहितहु नित निज कर्तव्य-शक्त
छी भेल करृमफल सँ विरक्त
छी बनल अछैतहुँ तन विदेह
तैं मानि  पितावत् सहित नेह
लक्ष्मी अवतरली स्वयं  जाय
होइछ सुकृतीकेँ सब सहाय
नहि विघ्न बुझू मंगल मनाउ
सकुशल उठाय लय भवन जाउ
छी धन्य अहाँ रिजर्षि- रत्न
ऐली कमला घर बिना यत्न
कविवर सीताराम झा  जानकी जन्मक बहुत रोचक कथा कहलनि अछि।सीताक अवतरणक कथा मे कविवर जी सीताक बाल्यकाल,किशोरी रूप आओर हुनक विवाह द्विरागमनक  बहुत सुन्दर वर्णन कयने छथि।ओ कहैत छथि सीता साक्षात् श्री स्वरूप छलथि।ओ विशेष उद्येश्यसँ मनुक्खक रूपमे अवतरित भेल छलीह।अम्बचरित जानकी जन्म कथाक महत्वपूर्ण महाकाव्य थिक।
'सीतायन' मैथिली साहित्यक अनमोल निधि अछि।सात खंड आओर उनचास सर्ग मे विभक्त एहि विशाल महाकाव्यक रचियता छथि वैद्यनाथ मल्लिक'विधु'।सीतायन महाकाव्यमे सीताक जन्म सँ ल'क' हुनक पाताल प्रवेश धरिक कथाक सांगोपांग वर्णन कयल गेल अछि। अछि ।पहिल सर्ग मिथिला दर्शनमे  जे मिथिला प्रदेशक वर्णन अछि ,से  जनमानसक मोनमे मिथिला प्रदेशक चित्र उपस्थित करैत अछि।मिथिलाक रीति रेवाज,कला संस्कृतिक , अध्यात्मिक उन्नति, कर्म प्रधान मिथिलाक वर्णन सीतायन महाकाव्यक एकगोट महत्वपूर्ण विशेषता अछि।सीता नारी शक्तिक प्रतीक छथि।सीताक बहन्ने महाकाव्यमे नारी शक्तिकें बहुत महत्वपूर्ण स्थान देल गेल अछि।सीतायण महाकाव्यमे पौराणिक कथाकें नवीनत शील्प ओ सौन्दर्यक संग जनमानसक समक्ष अनलनि अछि मल्लिक जी।समस्त संसारक साहित्यक इतिहासमे सीतासन शीलवान,गुणगरि नारी चरित्रक वर्णन  स्त्री जातिक लेल उत्कर्ष, प्रतिष्ठा ओ परम सम्मानक ओ आदरक बात अछि।द्रष्टव्य सीतायनक ई पांती--
'वाचक सीतायन ई शुचि सीताक चरित्रक
महामानवी एक तनिक कृतिकेर शुभ चित्रक
मर्यादा केर मूर्ति प्रिया मृणमयी सुखधामक
प्राणवल्लभा मर्यादा पुरोषत्तम रामक
शुभ चरित्र केर चित्र ई रामायण लिखि देल अछि
किछु करता राम से मुनि पहिनहि कहि देल।'
महकवि लालदास जकाँ मल्लिकजी सेहो सीताकें आदि शक्ति अवतार मानलनि अछि।सीताकें काली,पार्वती, लक्ष्मी,सरस्वती आदिक रूप मानलनि अछि।ईहो सीताकें जन्मना अयोनिजा कहलनि अछि जन्म कथाक वर्णन एना अछि--
'उद्भव शीतल कय जग,सीतोत्पत्ति शुभ प्रेम सं।
तनिक नाम सीता जपत,रहत सदा से क्षेम सँ।
सुखकर सुन्दर नाम सुनल षब कयल समर्थन।
जय सीता जय जनक करथि जयकार सकल जन।
सीताक जन्म सँ  ल' धनुषयज्ञ,विवाह, दूरागमक वर्ण भेबे कयल अछि राम द्वारा सीताक परित्याग करबा सँ कवि दुखी छथि।ई हिनक बिषादक भाव समस्त मिथिलाक भाव अछि।जे आइ धरि समस्त मिथिलावासीकें कचोटैत रहैत छनि।आइयो सीताक परित्याग कथा सुनि समस्त मैथिल संतानक देह सिहरि जाइत छनि।मन हाकरोश क' उठैत अछि।आक्रोश सँ भरि जाइतज अछि। सीतायन महाकाव्य मे सेहो एहि कृत्यक प्रति आक्रोन पकट कयल गेल अछि--
' सीता त्याग अति निन्दा छल
सीताक सुकीर्तिक वर्णन छल
मुनि बालक मुख सँ सुनि-सुनि सब आश्चर्य चकित आनन्दित छल
सुनि सीता सुयश रामदृगसँ झहरैत नोर दुखकर देखल
अबधक नारायणकें लक्ष्मी बिनु शोकाकुल मुनिवर देखल।
सीतायन मैथिली साहित्यक एकटा अनुपम ग्रन्थ अछि।एहि ग्रन्थमे सीताक उदात्त चरित्रक सांगोपांग वर्णन भेल अछि।कल्पनोमे जँ एहन सीता,जनकलली भेल छलीह तँ हमर ई दाबी अछि संसारक कोनो भाषाक साहित्यमे एतेक महान  ओ एहन आदर्श स्त्री पात्रक सृजन कियो कवि नहि क'सकल छथि।वास्तवमे रामायणमे सीताक भूमिका राम सँ बराबरीक अछि।कोनो चरित्र ककरो सँ झूस नहि।तथापि जखन एकटा साहित्यकारक रूपमे वाल्मीकि जीक ग्रन्थक आलोचकीय दृष्टि सँ देखैत छी तँ सीताक उदात्त चरित्र विराट छनि।महान छनि।
'मिथिलाक सिया धिया जगत जननी भेलीह धरणी बनल सुरधाम यौ।'
क्रमश:
दिलीप कुमार झा
dilipKumarjha4169@gmail.com

जे.जे. कॉलोनी:

  भाग-5  हेलो मनोहर! हम पुकारे हँ,भैया गोड़ लगैत छी खूब नीके रहू मनोहर। सब कुशल-मंगल! अहाँ तँ कहियो अबितो नहि छी।भेटघाट होइत रहबाक चाही ने।ह...